फिर वही ख़ामोशी


गले में कैमरा लटकाए वह बाजार में टहल रहा था. फोटोग्राफी के शौक में अक्सर वह यूँ ही टहलता रहता. कभी शहर में, कभी गाँव में, कभी बाजार में, कभी खेतों में, कभी दिन में, कभी रात में. टारगेट को फोकस करते ही एक पल को उसकी आँखें चमक उठीं. जो वहाँ उसकी कल्पना में नहीं था उसको ज़ूम करके उसकी वास्तविकता से परिचित होते ही वह उसी दिशा में लगभग दौड़ पड़ा.

“क्यों, तुम यहाँ कैसे, अचानक?” उसे अपने सामने देखकर वह भी चौंक उठी.

“तुम?” उसने भी सवाल पर जवाब के बजाय सवाल फेंका.

“हाँ, हम. तुम्हारा अचानक कैसे आना हुआ? कब आई? बताया भी नहीं?” उसने एकसाथ कई सारे सवाल उसी तरफ उछाल दिए.

“आराम से, आराम से.” उसने अपनी चिरपरिचित हँसी बिखेरते हुए उसे रोका और आगे बताया. “बस, ऐसे ही अचानक आना पड़ गया. हो गए दो-तीन दिन.”

“और हमें खबर भी नहीं?”

वह बिना कुछ बोले खामोश उसकी तरफ देखती रही. इतने वर्षों के बाद मिलने के बाद की ख़ामोशी को उसने ही चुहलबाजी करते हुए तोड़ा.

“मोटी हो गई हो.”

“और क्या, खाते-पीते घर की हूँ.” कहते हुए वही हँसी फिर आसपास थिरकने लगी, जिसका वह आज तक दीवाना है.

“चलो, घर चलते हैं.”

“आज नहीं, दो-चार लोग साथ हैं. कल कोशिश करती हूँ, आने की.”

“कोशिश नहीं, आना ही आना है.”

“बताती हूँ कल सुबह. अभी चलने दो. ठीक.” हाथ हिलाते हुए वह उसी दिशा में चल दी, जहाँ उसके साथ के लोग खरीददारी कर रहे थे.

चाहते हुए भी वह हाथ बढ़ाकर उसे रोक न सका. आज फिर वह उसे जाते हुए देखता रहा, वैसी ही ख़ामोशी से.



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