जूते की उछाल में छिपे सवाल भी उछल गए - व्यंग्य


जूता एक बार फिर उछला. जूते का निशाना एक बार फिर चूका. सवाल उठता है कि जूता अपने निशाने से क्यों भटक जाता है? सवाल ये भी कि या फिर जूते को लक्ष्य तक पहुँचाने वाले का मकसद सिर्फ जूता उछालना होता है? अब जूता उछला है तो लक्ष्य तक पहुँचना भी चाहिए. पहुँचता भी है मगर निरर्थक रूप से. न अपने लक्ष्य को भेदता है और न ही उछलने को सिद्ध करता है. वैसे जूते की उछाल राज्य स्तरीय होते-होते कब राष्ट्रीय से अंतर्राष्ट्रीय हो गई पता ही नहीं चला. इस वैश्विक छवि के बाद भी जूते की उछाल ने अपने मूल को नहीं छोड़ा. अपने राज्य स्तरीय स्वरूप को नष्ट नहीं होने दिया. वैसे जूते का उछलना बहुत कुछ कह देता है. 

प्रथम दृष्टया तो साफ समझ आता है कि आसपास कहीं चुनावी माहौल बन रहा है. एक बात ये भी हो सकती है कि जूते का उछलना सवालों का उछलना हो सकता है. इसके बाद भी हर बार बस जूता ही उछलता है, सवाल कहीं पीछे रह जाते हैं. सवालों के जवाबों को छोड़कर सब सामने आने लगता है. ये गलत है, लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हनन है. आखिर जूता उछालने वाले ने सिर्फ खबरों में आने के लिए तो जूता उछाला नहीं होगा? आखिर उसके जानबूझ कर निशाना चूकने या फिर धोखे से चूक जाने में भी कोई मामला छिपा होगा? इनको खबर बनाने के बजाय जूते को खबर बना दिया जाता है. और विडम्बना भी देखिये, उस जूते को खबर बना दिया जाता है जो अपने दूसरे साथी जूते से अलग हो गया. जो जूता अपने लक्ष्य से भटक गया. कम से कम एक बार उस निशानेबाज से भी जानकारी करनी चाहिए कि आखिर उसने जूते को उछालने का कृत्य क्यों किया? जो व्यक्ति उसके जूते का निशाना था वो किस लक्ष्य से भटका था? उछलने वाला जूता तुम्हारे अपने ही पैर का था या किसी और के पैर का था? 

जूते उछालबाज़ी की दुनिया में शायद ये सब निरर्थक सा लगे किन्तु अपने आपमें बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. आखिर यदि जो व्यक्ति निशाने पर था वो अपने लक्ष्य से भटका तो फिर निशानेबाज का निशाना क्यों चूका? यदि जूता अपने ही पैर का था तो फिर उस शिद्दत से क्यों नहीं उछला कि लक्ष्य से जा टकराता? यदि जूता उछालना महज प्रचार था तो फिर एक ही क्यों कई-कई जूते उछाले जा सकते थे? एक ही व्यक्ति पर क्यों कई-कई पर उछाले जा सकते थे? सिर्फ जूते ही क्यों? सिर्फ स्याही ही क्यों बहुत कुछ उछाला जा सकता था. चुनावी मौसम में ही जूते का उछलना क्यों? गौर से देखिये, तो ये सिर्फ जूता उछलने की क्रिया नहीं है वरन मानसिकता के उछलने की क्रिया है. लोकतान्त्रिक व्यवस्था के उछलकर गिरने की क्रिया है. जनतंत्र के जन से दूर होते जाने की प्रतिक्रिया है. काश कि अबकी जूता उछले तो निशाने पर लगे. काश कि अबकी जूता उछले तो सवालों को हल करता हुए उछले.

ब्याज पर बट्टा - व्यंग्य

‘माया महाठगिनी हम जानी’ के अमरघोष के बाद भी माया लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र सदैव बनी रही. इस मायामोह के चक्कर में लोग ज्यादा न फँसें, ज्यादा न बहकें इसके लिए समाज के ज्ञानी-ध्यानी बुजुर्गों ने ब्याज को हराम बताते हुए लोगों को इससे दूर रहने की सलाह दी. समाज ने इसे माना-स्वीकारा भी और एक लम्बे समय तक ब्याज के धन को अपनी-अपनी जेब से दूर रखा. परिवर्तन तो प्रकृति का सत्य है सो समाज में भी परिवर्तन दिखा. ज्ञानी बुजुर्ग लुप्त होते गए, ब्याज पाने की लालसा वाले जन प्रकट होते गए. ब्याज की रकम को वैधता प्रदान करने के लिए, उसके ऊपर से हराम की कमाई का काला ठप्पा हटाने का प्रयास किया गया. इस प्रयास में लोगों ने ‘मूल से अधिक सूद प्यारा होता है’ का नया नारा पेश किया. इस नारे को और भी व्यापक बनाने की नीयत ऊपर बैठे लोगों में भी दिखी. 

आखिर धन-लिप्सा तो उनके भीतर भी थी. सो जनता की चाहत और आकाओं की नीयत ने मिलकर एक नया रूप निर्माण किया. दीर्घ बचत, अल्प बचत, लघु बचत के नए-नए कलेवरों के माध्यम से ब्याज की रकम जेब के अन्दर करने का सर्व-स्वीकार्य कार्य नीचे से ऊपर तक किया गया. बुजुर्गों की नसीहत के अपराधबोध से निकल कर अब बचत के नाम पर ब्याज की रकम खूब अन्दर की जाने लगी. बचत की बचत, ब्याज का ब्याज, रकम पर रकम और कहीं से भी बिना मेहनत की कमाई का अपराधबोध भी नहीं. क्या खूब दिन थे, ‘पाँचों उँगलियाँ घी में और सर कड़ाही में’ था. 

तभी अचानक भूचाल सा आ गया. ज्ञानी-ध्यानी बुजुर्गों की आत्मा ने पुनर्जागरण किया. ब्याज दिए-लिए जाने में त्रुटिपूर्ण कृत्य दिखाई दिया. ऐसी आत्माओं ने तत्काल, विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए किसी भी रूप में जेब के अन्दर की जा रही ब्याज की कमाई पर अपना रोष प्रकट किया. प्राचीनता का अनुपालन करते हुए ब्याज को रोकने का उपक्रम शुरू किया. यद्यपि वे जनभावनाओं को समझते थे तथापि एकदम से कुल्हाड़ी न चलाते हुए महीन से कैंची चला दी. ऐसी कैंची, जिससे जेब भी न कटे और ब्याज की रकम भी पूरी न मिले. इधर लोग ब्याज की रकम से मौज मनाने के मूड में थे उधर बुजुर्गियत भरी आत्माओं ने विकास-विकास कहते हुए रंग में भंग कर दिया.