भ्रूण लिंग बताना कन्या भ्रूण हत्या रोकने का उपाय नहीं

कन्या भ्रूण हत्या के समाधान हेतु केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने गर्भस्थ शिशु के लिंग की जाँच करने और बताने वाला बयान दिया. उनका कहना है कि प्रत्येक गर्भवती महिला का पंजीकरण करने और गर्भ के शिशु का लिंग बता देने से कन्या भ्रूण हत्या मामलों में कमी आएगी. पंजीकृत गर्भवती महिला की जाँच की जा सकेगी कि उसने बच्चे को जन्म दिया अथवा नहीं. यकीनन केन्द्रीय मंत्री ने ऐसा बयान किसी विवाद के लिए नहीं दिया होगा किन्तु ये भी सत्य है कि महज इससे कन्या भ्रूण हत्या रुकने वाली नहीं है. इससे इंकार नहीं किया का सकता कि यदि प्रत्येक गर्भवती महिला का पंजीकरण हो जाये तो उसके बाद सहजता से ज्ञात किया जा सकता है कि जन्म लेने वाला शिशु बालक है अथवा बालिका किन्तु इसके लिए गर्भस्थ शिशु का लिंग बताना किसी भी रूप में समस्या का हल नहीं है.

समाज में कन्या भ्रूण हत्या वंश-वृद्धि की संकल्पना, मोक्ष-प्राप्ति की अवधारणा, बेटों द्वारा मुखाग्नि देने की रूढ़िवादिता, इक्कीसवीं सदी में भी बेटों को बेटियों के अनुपात में वरीयता देने की मानसिकता के कारण हो रही है. इसी कारण लिंगानुपात में जबरदस्त अंतर दीखता है. छह वर्ष तक की बच्चियों की संख्या वर्ष 2011 की जनगणना में 927 (प्रति हजार पुरुषों पर) थी वो 2011 में घटकर 914 रह गई है. यहाँ हमें ये ध्यान रखना होगा कि यही बेटियाँ भविष्य की माताएँ हैं. बेटे की चाह में लोग पीसीएनडीटी अधिनियम के प्रावधानों का दुरूपयोग करते हुए गर्भस्थ शिशु की लिंग जाँच करवा रहे हैं, बेटियों की हत्या गर्भ में करवा रहे हैं तो इसकी गारंटी कौन लेगा कि बैठे-बिठाये कानूनी रूप से लिंग ज्ञात होने के बाद ऐसे लोग बालिका शिशु को गर्भ में समाप्त नहीं करेंगे? ऐसी आपराधिक प्रवृत्ति के लोग पीसीपीएनडीटी अधिनियम की आड़ लेकर समाज में कन्या भ्रूण हत्या का घिनौना कारोबार संचालित किये हुए हैं. पीसीपीएनडीटी अधिनियम में कुछ विशिष्ट उद्देश्यों यथा गुणसूत्रों की असमानता, आनुवांशिक, शारीरिक, लिंग सम्बन्धी बीमारियों, जन्मजात विकलांगता आदि को ज्ञात करने के लिए प्रसव पूर्व जाँच की अनुमति मिली है. इसके साथ-साथ मेडिकल टर्मिनेशन एक्ट ऑफ़ प्रेगनेंसी (एमटीपी) 1971 में वर्णित प्रावधानों, जैसे किसी पंजीकृत चिकित्सक द्वारा निर्देशित होने पर, गर्भवती स्त्री की जान को खतरा होने पर, गर्भस्थ शिशु के विकलांग होने की आशंका पर, बलात्कार के कारण गर्भ ठहरने पर, पति-पत्नी द्वारा अपनाये गर्भ निरोधक उपायों के असफल होने पर गर्भपात करवाया जा सकता है. शरीर की आंतरिक बीमारियों की जानकारी के लिए बनाई गई अल्ट्रासाउंड मशीन तथा अधिनियम में वर्णित सकारात्मक प्रावधानों का दुरुपयोग समाज में कन्या भ्रूण हत्या के लिए किया जाने लगा.

ऐसे में केन्द्रीय मंत्री की सोच से कन्या भ्रूण हत्या रुकेगी एक कल्पोल कल्पना ही लगती है. जो लोग बेटियों को जन्म नहीं देना चाहते हैं वे मेडिकल टर्मिनेशन एक्ट ऑफ़ प्रेगनेंसी (एमटीपी) 1971 में वर्णित प्रावधानों का सहारा लेकर गर्भस्थ बालिका को समाप्त करवा देंगे. ऐसे लोग और ऐसे कार्यों में संलिप्त चिकित्सक आसानी से प्रमाणित कर देंगे कि गर्भवती स्त्री की जान को खतरा होने अथवा गर्भस्थ शिशु के विकलांग होने की आशंका के चलते गर्भपात करवाया गया है? इसके अलावा वर्तमान जीवनशैली, कार्यशैली, स्वास्थ्य सेवाओं की समुचित व्यवस्था न होने आदि से स्वतः गर्भपात (जिसे गर्भ-विफलता अर्थात मिसकैरिज कहा जाता है) भी हो जाता है. गर्भवती महिलाओं के खेतों में काम करने, कामकाजी महिलाओं को अवकाश न मिलने, गर्भावस्था के दौरान अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में आने-जाने, शारीरिक बनावट, अंदरूनी परेशानियों के चलते भी स्वतः गर्भपात हो जाता है. ऐसे में इसकी जाँच कौन करेगा कि सम्बंधित मामला गर्भ-विफलता का है अथवा कृत्रिम गर्भपात का? ऐसे में गर्भस्थ शिशु का लिंग ज्ञात हो जाने के बाद ये आशंका और प्रबल है कि गर्भवती महिलाओं को बेटी न जन्मने के लिए उन्हें बाध्य करते हुए औषधीय प्रयोग के द्वारा अथवा किसी अन्य विधि से उनका गर्भपात करवा दिया जाये. ऐसी कुप्रवृत्ति के लोग ऐसी घटनाओं में लिप्त चिकित्सकों से गर्भपात आनुवंशिक, असामान्य क्रोमोजोम, इम्यूनोलॉजिकल डिसऑर्डर, एनाटॉमिक, बैक्टीरिया-वायरस के इन्फेक्शन, एंडोक्राइन आदि के कारण होना साबित करवा सकते हैं.

वर्तमान में परिस्थितियां ऐसी हैं कि कानूनी उपायों से ज्यादा सामाजिक जागरूकता ही प्रभावी होगी. लोगों का अपनी सोच को बदलना ही ज्यादा उपयुक्त होगा. घर-परिवार के लोगों को समझाए जाने की आवश्यकता है, समाज की स्थापित महिलाओं को रोल-मॉडल बनाकर सामने लाने की आवश्यकता है. बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच को बचपन से ही जगाने की आवश्यकता है. संवेदनशीलता बढ़ाने के उद्देश्य से ऐसे नियमों, कानूनों आदि को प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक पाठ्यक्रम बनाये जाने की जरूरत है. लोगों को समझाना होगा कि चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि लगातार होते गर्भपात से महिला के गर्भाशय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और इस बात की भी आशंका रहती है कि महिला भविष्य में गर्भधारण न कर सके. पुत्र की लालसा में बार-बार गर्भपात करवाते रहने से गर्भाशय के कैंसर अथवा अन्य गम्भीर बीमारियाँ होने से महिला भविष्य में माँ बनने की अपनी प्राकृतिक क्षमता भी खो देती है. परिणामतः वह आने वाले समय में परिवार के लिए न तो पुत्र ही पैदा कर पाती है और न ही पुत्री. इसके साथ-साथ हमारी सजगता से ऐसे अपराधों पर बहुत हद तक नियंत्रण लगाया जा सकता है. हम अपने आसपास की, पड़ोस की, मित्रों-रिश्तेदारों की गर्भवती महिलाओं की जानकारी रखें, उनके बच्चे के जन्मने की स्थिति को स्पष्ट रखें. यदि कोई महिला गर्भवती है तो उसको प्रसव होना ही है (मिसकैरिज न होने पर) इसमें चाहे बेटा हो या बेटी. इधर देखने में आया है कि मोबाइल मशीन के द्वारा निर्धारित सीमा का उल्लंघन करके भ्रूण लिंग की जाँच अवैध तरीके से की जा रही है. हम जागरूकता के साथ ऐसी किसी भी घटना पर, मशीन पर, अपने क्षेत्र में अवैध रूप से संचालित अल्ट्रासाउंड मशीन की पड़ताल भी करते रहें और कुछ भी संदिग्ध दिखाई देने पर प्रशासन को सूचित करें. इसी के साथ-साथ जन्मी बच्चियों के साथ होने वाले भेदभाव को भी रोकने हेतु हमें आगे आना होगा. उनके खान-पान, रहन-सहन, पहनने-ओढ़ने, शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य-चिकित्सा आदि की स्थितियों पर भी ध्यान देना होगा कि कहीं वे किसी तरह के भेदभाव का, दुर्व्यवहार का शिकार तो नहीं हो रही हैं।


जनसहयोग के साथ-साथ प्रशासन को सख्ती से कार्य करने की जरूरत है. सरकारी, गैर-सरकारी चिकित्सालयों में इस बात की व्यवस्था की जाये कि प्रत्येक गर्भवती का रिकॉर्ड बनाया जाये और उसे समय-समय पर प्रशासन को उपलब्ध करवाया जाये. नौ माह बाद प्रसव न होने पर उसकी जाँच हो और सम्पूर्ण तथ्यों, स्थितियों की पड़ताल की जाये. यदि किसी भी रूप में भ्रूण हत्या जैसा आपराधिक कृत्य सामने आता है तो परिवार-डॉक्टर को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए. ऐसे परिवारों को किसी भी सरकारी सुविधा का लाभ लेने से वंचित कर दिया जाये, चिकित्सक का लाइसेंस आजीवन के लिए रद्द कर दिया जाये, ऐसे सेंटर्स तत्काल प्रभाव से बंद करवा दिए जाएँ और दंड का प्रावधान भी साथ में रखा जाये. यदि इस तरह के कुछ छोटे-छोटे कदम उठाये जाएँ तो संभव है कि आने वाले समय में बेटियाँ भी समाज में खिलखिलाकर अपना भविष्य संवार सकती हैं.

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उक्त आलेख जन्संदेश टाइम्स, दिनांक - 05-02-2016 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया.

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