इन्सान देवता की तरह, देवता इन्सान की तरह खेले


विश्वकप क्रिकेट के दौरान तो जैसे एकाएक कारनामा हो गया, हमारे खिलाडी पाकिस्तान के खिलाफ मैच क्या जीते, समूचा मीडिया कह उठा कि ऐसा लगा मानो देवता खेल रहे हों. मीडिया ने कहा तो समूची जनता को भी कहना, मानना पड़ा और देखते ही देखते इंसानी खिलाड़ी भगवान हो गए. हार के पास पहुँच कर भी जीतते-जीतते हमारे देवता फाइनल मैच तक आ गए. अब लगा कि इन देवताओं को भी शक्ति की आवश्यकता है. यज्ञ, हवन, व्रत, उपवास आदि किये जाने लगे; कोई अंक विद्या का ज्ञाता पांच अंक का मन्त्र ज्ञात कर बैठा. समूची शक्ति इन कागजी शेरों (क्रिकेट के देवताओं) को जिताने में लग गई. 
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फाइनल हुआ, देवता इन्सान की तरह खेले और दूसरे इन्सान चैम्पियनों की तरह. हमारे देवता हारे, विपक्षी इन्सान जीते. सारी की सारी आँकड़ेबाज़ी धरी की धरी रह गई. सारे यज्ञ, हवन शांत हो गए, सारे व्रत, उपवास खंडित हो गए, बाकी बचा तो बस आंसुओं का सैलाब, न दांये-बांये का चक्कर काम आया और न ही अंक विद्या का पांच का मन्त्र. तो इसमें निराशा की क्या बात है? सन १९८३ के बाद से और हो क्या रहा है? हर बार हमारी टीम के विश्वकप जीतने की सम्भावना प्रबल होती है और हर बार हम हार जाते हैं. कहीं न कहीं तो कमी रह ही जाती है? कहाँ? बस यही नहीं पता. खैर... अगला विश्वकप सन २००७ में है और यह तो हम निश्चित ही जीतेंगे. कहो कैसे? तो जरा निगाह नीचे भी डालें....
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१. भारत ने पहला विश्वकप जीता था लगातार दो बार की विश्वकप विजेता वेस्टइंडीज़ को हराकर. तब से न कोई लगातार दो बार विश्वकप जीता और न भारतीय टीम ने किसी को हराया. अब आस्ट्रेलिया ने लगातार दो बार विश्वकप जीता, तो अगली बार भारत ही विश्वकप जीतेगा, आस्ट्रेलिया को हराकर.
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२. भारत ने विश्वकप जीता था सन १९८३ में, यानि कि अंक विद्या के अनुसार १+९+८+३=२१=२+१=३, अंक आया तीन. सीधी सी बात है कि भारत उसी वर्ष विश्वकप जीतेगा जिस वर्ष का अंक तीन का गुणांक होगा. इस दृष्टि से आगामी विश्वकप सन २००७ का अंक भी ९ हो रहा है, तो जीत पक्की.
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३. सन १९८३ का विश्वकप तीसरा विश्वकप, वर्ष का अंक भी तीन, इसी तरह आगामी विश्वकप नौंवां और वर्ष का अंक भी तीन. तो समझो कि विश्वकप भारतीय टीम का हो गया.
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४. अंक विद्या वालों को पता होगा कि तीन, छह, नौ के अंक एक ही वर्ग के होते हैं. इस दृष्टि से भारत का विश्वकप छठे अथवा नौंवें विश्वकप में आना पक्का होता. छठा तो गया, आगामी है नौंवां, तो सभी भक्तो मगन हो जाओ और मौज करो.
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आह!!... अब थोड़ी राहत मिली लोगों को, नहीं तो लग रहा था कि जैसे अपनी इज्जत ही हार गए. करोड़ों रुपयों की बर्बादी के बाद भी खाली हाथ!! कभी सोचता हूँ कि आँकड़ेबाज़ी, इतने यज्ञ, हवन, व्रत, उपवास, इतनी मान्यता, इतना धन यदि हम गरीबी, भ्रष्टाचार, आतंक, हिंसा, भूख, बेरोजगारी मिटाने के लिए करें तो शायद कोई समस्या ही नहीं रहे. पर नहीं, हम तो इन्सान हैं, इंसानों को तो सारी समस्याएं सहनी ही पड़ेंगी. आँकड़ेबाज़ी, यज्ञ, हवन, व्रत आदि तो देवताओं के लिए हैं, सो हम लोग कर ही रहे हैं..... फिर देवता कुछ भी करें.... चाहें हारें, चाहें जीतें. हम तो मगन रहेंगे और समस्याओं में जियेंगे, मरेंगे.... फिर अगले विश्वकप के लिए भी तो आँकड़ेबाज़ी, कारीगरी, बाजीगरी करनी है अभी.... है कि नहीं!!
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कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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(वर्ष २००३ में फ़ाइनल में भारतीय टीम की शर्मनाक पराजय के बाद लिखा व्यंग्य. ये व्यंग्य स्थानीय समाचार पत्रों.... दैनिक कर्मयुग प्रकाश और दैनिक अग्निचरण के २९ मार्च २००३ के अंक में प्रकाशित भी हुआ था.)

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