प्रकृति के नियम में भी असहिष्णुता

जो ऊपर जायेगा वो नीचे भी आएगा, जो कहीं चढ़ा है वो वहाँ से उतरेगा, ये प्रकृति का नियम है. इधर देखने में आ रहा है कि प्रकृति के इस नियम ने अपने आपको माहौल के अनुसार ढाल लिया है. अब देखिये न, कई-कई वस्तुओं के दाम एक-एक करके लगातार अपने आपको ऊपर ले जा रहे हैं किन्तु नीचे आने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. दाल ने अपने रूप को विकराल करना शुरू किया तो फिर थामा ही नहीं. देखादेखी अब टमाटर गुस्से के मारे लाल होकर लगातार दाल के समकक्ष खड़ा होने का मन बनाने लगा है. हालाँकि बीच-बीच में प्याज ने उठने की कोशिश की किन्तु उसने प्रकृति के नियम का पालन करते हुए वापस आने में ही भलाई समझी. दाल, टमाटर की बढ़ती कीमतों के न घटने वाले स्वरूप से जैसे-तैसे समझौता करके मान लिया गया कि ये वापस अपने रूप में लौटने वाले नहीं हैं. मन को संतोषम परम सुखम की घुट्टी पिलाकर इनको इसी वर्तमान स्वरूप में ग्रहण करना शुरू कर लिया गया.

अभी देह को मंहगाई के झटकों से कुछ राहत मिलने का एहसास होने ही वाला था कि कुछ और जगह से रूप विस्तार की खबरें आनी शुरू हो गईं. देश को स्वच्छ करने के नाम पर रेलवे ने नागरिकों की जेबें साफ़ करने का मंतव्य स्पष्ट किया. देश को स्वच्छ रखने की जिम्मेवारी रेलवे ने अपने यात्रियों के सिर मढ़ दी. अब यात्रा किराये के बढ़ते स्वरूप को तो वापसी करनी ही नहीं है भले ही प्रकृति का नियम चाहे जो कुछ बना रहे. प्रकृति से लगातार इस तरह की छेड़छाड़ करने वाले किसी भी रूप में समाज का भला नहीं कर सकते.


इस बात की भी सम्भावना है कि या तो प्राकृतिक नियम को खरीद लिया गया है या फिर वो भी जन-विरोधी हो गई है. देखा जाये तो ये भी एक तरह की भक्ति है और शायद इसी भक्ति में प्रकृति का ये नियम अपनी सहिष्णुता खो बैठा है. वैसे इस असहिष्णुता के माहौल में, जबकि सब कुछ जन-विरोधी होता दिख रहा है, एकमात्र शराब ही ऐसी सहायक सामग्री है जो प्रकृति के नियम का अक्षरशः पालन कर रही है. पूरे सुरूर में चढ़ती है तो उसी सुरूर में उतर भी जाती है. 

स्वागत हो आने वाले का

एक उम्र के बाद हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि बढ़ती आयु में उसके घर-परिवार वाले उसका ख्याल रखें. इस अभिलाषा के मोहपाश में सभी घिरे होते हैं, वो चाहे अमीर हो अथवा गरीब, राजा हो अथवा फ़कीर, दयालु हो या क्रूर, निरपराध हो या फिर अपराधी. यदि इसी अभिलाषा के चलते छोटा सा राजन वापस घर आने की तत्परता दिखा रहा है तो इसमें बुरा क्या है? एक तो उसकी उम्र बढ़ती जा रही है, जिसके लिए उसे सहारे की आवश्यकता है. दूसरे उसके काम भी इतने महान रहे हैं कि सहारा देने वाले उसको टपकाने में कुछ कमी नहीं रखेंगे. इसके अलावा वो एक बात विशेष रूप से जानता है कि सम्पूर्ण विश्व में हमारे देश में चिकित्सा सेवा भले ही वैश्विक स्तर पर किसी भी श्रेणी की हो पर चिकित्सकीय खर्चों में हम सबसे कम खर्चीले देश में शुमार किये जाते हैं. चिकित्सा सेवा के साथ-साथ अतिथि देवो भव, सर्वे भवन्तु सुखना, वसुधैव कुटुम्बकम जैसे अमर वाक्यांशों के चलते हमारे देश की मेहमाननवाजी की अपनी ही विशिष्टता है. उस पर भी यदि ये सारी सुविधाएँ सरकारी खर्चों पर उपलब्ध हो जाएँ तो फिर सोने पर सुहागा हो जाता है. अब ऐसे में उस बेचारे मासूम से छोटे ने घर वापसी का मन बना लिया है तो हम सभी को उसका स्वागत करना चाहिए. 

स्वागत इस कारण से भी किया जाना चाहिए कि कल को पता नहीं कि किस काले कोट वाले की बुद्धि की कृपा पाकर वो देश की सडकों पर स्वतंत्र, निरपराधी बना टहलता मिले; क्या पता किस राजनैतिक दल की नज़रें इनायत हों और वह सांसद, विधायक, मंत्री बना हम पर शासन करता दिखे; क्या पता किस विमर्शवादी की चपेट में आकर शांति के नोबल पुरस्कार हेतु नामित दिखे. वैसे भी मृत्यु तो सबको ही आनी है, उसे भी आएगी, उससे पहले वो जिस प्रशासन से तमाम उम्र भागता रहा, कुछ वर्ष उसी प्रशासन की सुख-सुविधाओं में, छत्र-छाया में गुजार कर मौज मना ले तो क्या बुराई है? मरने के बाद अपने घर की मिट्टी में मिल जाना भी उसके लिए कम सुखद नहीं रहता जो ताउम्र घर से बाहर ही कामधाम करता रहा हो. 

आइये हम सब उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए उसके आतिथ्य के लिए अपने को सहज भाव से तत्पर करें, क्या पता कल को उसकी मृत्यु के बाद उसकी समाधि तीर्थस्थल ही बन जाये?

शाब्दिक विकृति से बचने की आवश्यकता है


भूमंडलीकरण के इस दौर में संचार-साधनों ने अपनी उपयोगिता को सिद्ध किया है. सूचना युग होने के कारण से संचार माध्यमों की महत्ता जनसम्पर्क के लिए और बढ़ जाती है. जनसंचार क्रांति के इस दौर में जहाँ संचार-माध्यमों ने विकास किया है वहीं ये भी माना जा रहा है कि हिन्दी ने भी उत्तरोत्तर अपना विकास किया है. अंग्रेजी को आज भले ही विश्वव्यापी संपर्क भाषा के रूप में स्वीकार किया जा रहा हो किन्तु इसके साथ-साथ हिन्दी ने भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है. बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने हिन्दीभाषियों के मध्य अपने उत्पादों के लिए व्यापक बाज़ार देखने के बाद हिन्दी को महत्त्व देना आरम्भ किया है. उन्होंने अपने यहाँ के कर्मचारियों, अधिकारियों को हिन्दी सीखने के निर्देश दिए साथ ही ऐसी कंपनियों के विज्ञापन हिन्दी में देखे जा सकते हैं. सबसे बड़ी बात ये है कि ऐसा सिर्फ भारत में नहीं वरन विदेशों में भी हो रहा है. 

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हिन्दी-प्रेम के बाद इंटरनेट ने भी हिन्दी को विकसित होने के पर्याप्त अवसर प्रदान किये. सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों के द्वारा हिन्दीभाषियों ने अपनी भाषा में अपनी विचाराभिव्यक्ति करके हिन्दी को समृद्ध करने का कार्य किया. आस-पड़ोस की घटना हो या फिर प्रादेशिक-राष्ट्रीय स्तर की कोई खबर, सोशल मीडिया के कारण वो तुरंत हमारे-आपके बीच उपस्थित होती है और वो भी हमारी अपनी भाषा में. इसके अतिरिक्त हिन्दी साहित्य को लेकर भी समृद्धता देखने को मिली है. शब्द-भंडार में वृद्धि हुई है, रचनाओं की बहुलता देखने को मिली है, दुर्लभ रचनाओं ने परदे के पीछे से निकल कर इंटरनेट पर अपना स्थान बनाया है. हिन्दी न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिष्ठित हुई है.

इस प्रतिष्ठा के बाद भी कभी-कभी लगता है कि जनसंचार माध्यमों ने हिन्दी के साथ दोहरा रवैया अपनाया हुआ है. एक तरफ हिन्दी के विकास को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं; इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा हिन्दी को लेकर सकारात्मकता दिखाई जाती है; मीडिया में बड़े-बड़े आयोजन हिन्दी को लेकर किये जाते हैं; सितम्बर माह आते ही हिन्दी भाषा की याद सभी को सताने लगती है किन्तु वास्तविकता में एहसास होता है कि यही माध्यम हिन्दी को दोयम दर्जे का बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं. हिन्दी के साथ नकारात्मक रवैया अपनाने में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ-साथ प्रिंट मीडिया भी शामिल है. जिस तेजी से भूमंडलीकरण ने, वैश्वीकरण ने अपने पैर पसारे हैं, जिस तेजी से औद्योगिकीकरण ने आम आदमी में सहज उपस्थिति बना ली है, जिस तरह से आधुनिकता ने समाज में अपनी स्वीकार्यता बना ली है उसमें अपेक्षा की जाती है कि आम आदमी भी तकनीकी रूप से समृद्ध हो. इसका सीधा सा तात्पर्य उपकरणों के प्रयोग के साथ-साथ भाषाई जड़ता से मुक्ति पाने से भी लगाया जाता है. देखने में आया है कि तकनीकी रूप से मानव ने समृद्ध होकर उपकरणों पर अपनी निर्भरता बहुत अधिक बना ली है वहीं नई युवा पीढ़ी ने भाषाई जड़ता को तोड़ते हुए भाषा के सभी बने-बनाये मानदंडों को ध्वस्त कर दिया है, हालाँकि ऐसा अंग्रेजी भाषा के साथ बहुतायत में हो रहा है जहाँ कि इसका उपयोग मोबाइल सन्देश में, सोशल मीडिया के अन्य दूसरे माध्यमों में किया जा रहा है. हिन्दी में ये आज़ादख्याल युवा विखंडन की स्थिति को पैदा नहीं कर सके हैं, ये अलग बात है कि इनका रुझान बजाय हिन्दी भाषा के अंग्रेजी भाषा की तरफ बढ़ा है. हिन्दी में इस तरह की नकारात्मक स्थिति को, भाषाई विखंडन, भाषाई विद्रूपता की स्थिति को हिन्दी माध्यमों के संचार-साधनों ने बढ़ाया है.

जनसंचार माध्यमों में चाहे प्रिंट मीडिया रहा हो अथवा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों में हिन्दी भाषा के प्रति उपेक्षा का भाव बना हुआ है. यद्यपि ये देखने में अवश्य आ रहा है कि इनके द्वारा हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है; कार्यक्रम, समाचार, विज्ञापन आदि हिन्दी भाषा में दिखाए-प्रकाशित किये जा रहे हैं तथापि उनकी भाषा में ही विसंगति उत्पन्न करके हिन्दी भाषा की उपेक्षा सी की जा रही है. हिन्दी-भाषी समाचार-पत्रों में, समाचार चैनलों में हिन्दी के स्थान पर जबरन अंग्रेजी के शब्दों को ठूंस कर, वाक्य संरचना विकृत करके, वाक्य-विन्यास बिगाड़ कर, वर्तनी की अशुद्धियों के द्वारा, भाव-बोध, क्रिया-बोध को अशुद्ध रूप में प्रस्तुत करके हिन्दी भाषाई अवमूल्यन का बोध कराया जा रहा है. चंद उदाहरण से इसे सहजता से समझा जा सकता है.

यूनिवर्सिटी के वी०सी० हटाये गए. (विश्वविद्यालय के स्थान पर यूनिवर्सिटी और कुलपति के स्थान पर वी०सी० का प्रयोग). एस०सी०/एस०टी० विद्यार्थियों को एडमीशन के लिए निशुल्क फॉर्म वितरण. (अनुसूचित जाति/जनजाति के स्थान पर एस०सी०/एस०टी० का, प्रवेश के स्थान पर एडमीशन तथा आवेदन-पत्र के स्थान पर फॉर्म का प्रयोग किया जाना). तालाब में लाश तैरती पाई गई. (यहाँ क्रियात्मक त्रुटि है, लाश बेजान है जो सकर्मक क्रिया नहीं कर सकती, जबकि तैरना सकर्मक क्रिया है.). मजिस्ट्रेट द्वारा भगाई गई लड़की का बयान दर्ज किया गया. (यहाँ क्रम विपर्यय और अंग्रेजी शब्द का प्रयोग है, शुद्ध वाक्य भगाई गई लड़की का बयान न्यायाधीश द्वारा दर्ज किया गया होना चाहिए). महिला लेखिकाओं ने गोष्ठी में विचार व्यक्त किये. (लेखिकाओं होने के बाद महिला की आवश्यकता नहीं रह जाती है). अनेकों नागरिकों ने जन-धन योजना में खाता खुलवाया. (अनेक अपने आपमें बहुवचन है और उसका बहुवचन बनाना शाब्दिक विकृति ही कही जाएगी). गंगा खतरे के निशान से ऊपर. (यहाँ शब्द लोप है, गंगा नदी का प्रयोग होना चाहिए था)

उज्ज्वल के स्थान पर उज्जवल, संन्यासी के स्थान पर सन्यासी, तत्त्व के स्थान पर तत्व, पूजनीय के स्थान पर पूज्यनीय आदि का प्रयोग किया जाना बहुतायत में हो रहा है, जो सर्वथा गलत है. अनुस्वार और अनुनासिका लगाने में किसी तरह का भेद नहीं किया जा रहा है. अनुनासिका के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग सहजता से होते देखा जा रहा है. इसके अलावा वर्तनी की अशुद्धियाँ, शाब्दिक अशुद्धियाँ बहुतायत में देखने को मिलती हैं. यद्यपि लोगों द्वारा इन गलतियों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है तथापि भाषाई दृष्टि से ऐसा होना गलत और निंदनीय है.

भाषाई सम्पन्नता का अर्थ यह नहीं है कि शब्दों का प्रयोग किसी भी रूप में होने लगे, भले ही वे बहुतायत में प्रयुक्त हो रहे हों. भाषाई समृद्धता का अर्थ भाषा के, शब्दों के उचित क्रियान्वयन से है. यदि हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो कहीं न कहीं भाषाई रूप से अपनी विपन्नता को प्रकट कर रहे हैं. इसके पीछे हमारा अपनी भाषा से दूर होते जाना है. यही कारण है कि आज हम हिन्दी में बातचीत करते समय हर दो-तीन शब्दों के बाद अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करते हैं. हिन्दी भाषा का, हिन्दी शब्दों का प्रयोग करना फूहड़ता नहीं है; विदेशी भाषा के शब्दों का प्रयोग करना हमारी मानसिक विकृति को नहीं दर्शाता है बशर्ते कि हम भाषा का, शब्दों का सही ढंग से प्रयोग कर रहे हों. जनसंचार माध्यमों, विशेष रूप से प्रिंट माध्यमों को इस बात को समझना होगा कि हम आज भी आधुनिकता के इस दौर में किसी भी प्रकाशित कागज को माँ सरस्वती के रूप में देखते हैं; उस पर पैर लग जाने पर उसे सम्मान से माथे पर लगाते हैं, ऐसे में उनकी जिम्मेवारी बनती है कि वे भाषाई शुद्धता का विशेष ख्याल रखें. उन्हें समझना होगा कि यदि आज वे इस तरह की भाषाई विकृति पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करेंगे तो वे भविष्य की एक पीढ़ी को न केवल भाषाई विकास से अछूता कर रहे हैं बल्कि कहीं न कहीं उनमें हिन्दी भाषाई विपन्नता भी पैदा कर रहे हैं.
 


मत रोना मुझे चाहने वालो, मैं चलती हूँ

मत रोको मुझे रोकने वालो, मैं चलती हूँ.

मत रोना मुझे चाहने वालो, मैं चलती हूँ.
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अंश थी मैं वीणावादिनी का, ऋग्वेद की एक ऋचा थी,
रूद्र जटाओं से जो निकली, वो लहर थी सुर सरिता की,
रूप कोई हो, रंग कोई हो, हर स्वरूप में मैं बसती हूँ,
मत रोको मुझे रोकने वालो, मैं चलती हूँ.
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संगीत मेरा अस्तित्व बनेगा, शब्द मेरी पहचान बनेंगे,
मेरे गीत, ग़ज़ल और कविता, कोटि-कोटि कंठों में सजेंगे,
सुर में, लय में और ताल में, धुन बन कर मैं सजती हूँ,
मत रोको मुझे रोकने वालो, मैं चलती हूँ.
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नश्वरता में न खोजो मुझको, अंतर्मन में देखो मुझको,
मनसा, वाचा और कर्मणा की दुनिया में खोजो मुझको,
प्रेम, स्नेह, आदर, सम्मान के, रिश्तों में मैं पलती हूँ,
मत रोको मुझे रोकने वालो, मैं चलती हूँ.
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आज (09-09-2015) डॉ० वीना श्रीवास्तव 'वीणा' आंटी की त्रयोदशी-संस्कार था. ऐसा लगा जैसे वे अप्रत्यक्ष रूप से सबको एक सन्देश दे रही हों....

उच्च शिक्षा में लगातार आती गिरावट


एक तरफ सरकारी स्तर पर शैक्षिक उन्नयन की नीतियां बनाई जाती हैं, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा नित ही कोई न कोई नियम निकाल कर उच्च शिक्षा गुणवत्ता लाये जाने के प्रयास किये जाते हैं दूसरी तरफ खुद उसी के द्वारा उच्च शिक्षा के साथ खिलवाड़ किया जाता है. यदि गंभीरता से देखा जाये तो किसी भी क्षेत्र में शोध का अपना महत्त्व है और अध्यापन का अपना महत्त्व है. इन दोनों को आपस में मिलाकर किसी भी तरह से भला नहीं किया जा सकता है. उच्च शिक्षा की बात की जाये तो यहाँ जैसे एक तरह की अनिवार्यता कर दी गई है कि जो अध्यापन के लिए आया है, उसे शोध कार्य भी करना है. इस सोच के चलते ही यूजीसी की तरफ से, सरकार की तरफ से, विश्वविद्यालयों की तरफ से लगातार उत्कृष्ट शोधकार्यों के लिए प्रयास किये जाते रहे हैं किन्तु उन पर वास्तविक रूप से अमल नहीं किया जाता रहा है. ऐसा लगता है जैसे इन संस्थाओं का वास्तविक उद्देश्य किसी भी रूप में व्यक्ति को पी-एच०डी० की उपाधि प्रदान करवा देना है, शोधकार्य की प्रमाणिकता, उसकी मौलिकता, स्तरीयता को जांचे-परखे बिना स्वीकृति प्रदान कर देना मात्र रह गया है. यदि ऐसा न होता तो आज भी तमाम विश्वविद्यालयों से पी-एच०डी० के नाम पर कूड़ा-करकट समाज में न आया होता; यदि ऐसा न हो रहा होता तो शैक्षिक क्षेत्र में मौलिक शोधकार्यों का अभाव न दिख रहा होता; यदि ऐसा न हो रहा होता तो अध्यापन कार्य में रत बहुतायत लोगों को इधर-उधर से जोड़-तोड़ कर अपना शोधकार्य पूरा न करना पड़ रहा होता; यदि ऐसा न हो रहा होता तो अनेकानेक प्राध्यापकों को जुगाड़ तकनीक का सहारा लेकर अपने स्कोर को समृद्ध न किया जा रहा होता. अध्यापन कार्य में सहजता, सर्वोत्तम कार्य करने वाले व्यक्ति को यदि शोधकार्य में असहजता, असुविधा महसूस होती है तो क्या आवश्यक है कि उसे भी शोधकार्य के लिए जबरन धकेला जाये? ठीक इसी तरह का व्यवहार उस व्यक्ति से भी किया जाता है जो स्वयं को शोधकार्य के लिए उपयुक्त पाता है, अपनी सोच का, अपनी मौलिकता का शोधकार्य में गुणवत्तापूर्ण उपयोग कर सकता है. ऐसी स्थिति में सोचा जा सकता है कि कोई अपनी भूमिका के साथ न्याय कैसे कर सकता है?
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इसके साथ-साथ प्राध्यापकों के कैरियर के लिए गुणांकों की अनिवार्यता ने इस स्थिति को और भी विकृत कर दिया है. इसके चलते जहाँ एक तरफ रिसर्च जर्नल्स की बाढ़ सी आ गई है, राष्ट्रीय के क्या कहने अब तो अंतर्राष्ट्रीय जर्नल बाज़ार में थोक के भाव से दिख रहे हैं वहीं दूसरी तरफ इसने बौद्धिकता को भी बाज़ार बना दिया है. चंद रुपयों की कीमत पर शोध-पत्र प्रकाशित किये जा रहे हैं; सेमिनार, गोष्ठी आदि के प्रमाण-पत्र बांटे जा रहे हैं; घर में प्रकाशन खोलकर, पुस्तकों से सामग्री की चोरी कर, उसमें जरा सा हेर-फेर करके अपने नाम से अंधाधुंध प्रकाशन किया जा रहा है. रातों-रात अध्यापन कार्य में संलिप्त रहने वाले तमाम प्राध्यापक सैकड़ों पुस्तकें छपवाकर साहित्यकार बन गए, कॉपी, कट, पेस्ट की तकनीक को अपनाकर न जाने कितने प्राध्यापक हजारों-हजार लेखों के रचयिता बन गए, रत्ती भर शोधकार्य न करवाने के बाद भी न जाने कितने विद्यार्थियों को अपने निर्देशन में पी-एच०डी० की उपाधि प्रदान करवा चुके हैं. ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी बहुतायत लोगों के चलते उच्च शिक्षा में शोध के नाम पर, अध्यापन के नाम पर लगातार गिरावट आ रही है.
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ऐसा नहीं है कि आयोग को, सरकार को या फिर विश्विद्यालयों को इसकी भनक न हो किन्तु वैश्विक स्तर पर इन उच्च शिक्षा संस्थानों में शोध-कार्यों की, अध्यापन की उत्कृष्टता दर्शाने के लिए कागजी घोड़े दौड़ाये जा रहे हैं. इन कागजी घोड़ों की दौड़ में निजी शैक्षणिक संस्थानों,  ने शामिल होकर उच्च शिक्षा का रहा-सहा कचूमर निकाल कर रख दिया है. ‘कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा’ की तर्ज़ पर इनके द्वारा शिक्षा व्यवस्था को संचालित किया जा रहा है. गाँव-गाँव, खेतों के मध्य खड़ी होती इमारतें, तमाम सारे पाठ्यक्रमों का सञ्चालन, हजारों-हजार विद्यार्थियों का प्रवेश किन्तु अध्यापकों के नाम पर जबरदस्त शून्यता. स्थिति की भयावहता, उच्च शिक्षा के मखौल का इससे ज्वलंत उदाहरण क्या होगा कि महाविद्यालय में किसी विषय में अनुमोदन किसी और व्यक्ति का है, उसके स्थान पर महाविद्यालय में पाया कोई और व्यक्ति जा रहा है. विश्वविद्यालय स्तर से अनुमोदित व्यक्ति न केवल एक महाविद्यालय में ही नहीं वरन कई-कई दूसरे विश्वविद्यालयों के महाविद्यालयों में अनुमोदित है. बेरोजगारी की मार के बाद स्थिति यहीं तक आकर रूकती तो भी शायद गनीमत कही जा सकती थी. स्थिति की भयावहता को ऐसे समझा जा सकता है कि कई-कई अध्यापक तो इस तरह के अनुमोदित कर दिए गए हैं जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है. किसी के शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों की फोटोकॉपी के साथ छेड़छाड़, किसी की फोटो के साथ एडिटिंग, किसी दूसरे व्यक्ति की उपस्थिति और फिर बाकी का काम लेन-देन के माध्यम से यथास्थिति को प्राप्त हो जाता है. बिना योग्यता सूची प्रवेश की सहजता, कक्षाओं में न आने की स्वतंत्रता, नक़ल-युक्त परीक्षाओं की व्यवस्था, उड़नदस्ता द्वारा पकड़े जाने पर विश्वविद्यालय से निर्दोष साबित करवाए जाने की सुविधा... सोचिये ऐसे में किस नियम से, किस विधान से, कौन सी सरकार, कौन सा आयोग उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार कर देगा?
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स्थिति अत्यंत विकराल है, शिक्षा के साथ घनघोर मजाक हो रहा है और ऐसा महज उच्च शिक्षा क्षेत्र में ही नहीं अपितु शिक्षा के आरंभिक बिन्दु से ही हो रहा है. शिक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ करने का दुष्परिणाम है कि जहाँ किसी समय हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था गौरव का विषय हुआ करती थी आज हम विश्व के सैकड़ों सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में भी शामिल होने से वंचित रह जा रहे हैं. ऐसी व्यवस्था के लिए किसी एक को दोष देना उचित नहीं है. एक तरफ सरकारें हैं जिनके पास कोई जमीनी नीति नहीं है, एक तरफ आयोग है जिसके पास क्रियान्वयन के कोई ठोस बिन्दु नहीं हैं, एक तरफ राज्य सरकारें हैं जो किसी भी नीति पर केन्द्र सरकारों से दुश्मनी निकालती रहती हैं, एक तरफ विश्वविद्यालय हैं जिनके पास नीति-निर्देशक नहीं हैं, एक तरफ महाविद्यालय हैं जिनके पास नियंत्रण नहीं है. ऐसे में उच्च शिक्षा में गुणवत्तापूर्ण विकास होगा, कहना मुश्किल है; ऐसे में शोधकार्यों में वैश्विक पहचान मिलेगी, सोचना भी हास्यास्पद है; ऐसे में अध्यापन कार्यों के द्वारा ज्ञान का प्रसार होगा कपोलकल्पना है; ऐसे में विद्यार्थियों द्वारा शिक्षा व्यवस्था के प्रति विश्वास जागेगा भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है. जिस तरह से नीतियों के अभाव में, गुणवत्ता के अभाव में, अध्यापन के अभाव में उच्च शिक्षा में गिरावट आई है; छात्रसंघ चुनावों के चलते विद्यार्थी अनुशासनहीन हुआ है, उससे उच्च शिक्षा का भविष्य काला दिखाई दे रहा है, संकटग्रस्त दिखाई दे रहा है. अब आवश्यकता वातानुकूलित कमरों में बैठकर नीतियां बनाने मात्र से नहीं वरन नीतियों का व्यावहारिक क्रियान्वयन करवाने से कोई सार्थक, सकारात्मक हल निकलेगा.

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उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स दिनांक 19-08-2015 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है. 
http://www.jansandeshtimes.net/index.php?spgmGal=Uttar_Pradesh/Kanpur/Kanpur/19-08-2015&spgmPic=7 

तेरी चाहत में मेरा हाल कुछ ऐसा हुआ हमदम

गँवारा है न इन आँखों को, तुम्हारा दूर हो जाना,
मचलना धड़कनों का और सांसों का बहक जाना.
तेरी चाहत में मेरा हाल कुछ ऐसा हुआ हमदम,
न देखूं तो परेशानी, मिलो तो आये शरमाना.

तुम आओ आ भी जाओ अब, न मुझको सताओ अब,
भरो बांहों में तुम अपनी, गले अपने लगाओ अब.
तेरी चाहत में मेरा हाल कुछ ऐसा हुआ हमदम,
रहकर तुमसे दूर मुश्किल है इस दिल को समझाना.

घटायें बरसी हैं या फिर मेरे आंसू के धारे हैं,
मेरी हालत पर गुमसुम ये चंदा और सितारे हैं.
तेरी चाहत में मेरा हाल कुछ ऐसा हुआ हमदम,
मुझे रोना ही आया है, जब भी चाहा मुस्काना.

मिले हो आज वर्षों में, सदियों तक संग रहना,
विरहिणी के मरुस्थल में बन सावन बरस जाना.
तेरी चाहत में मेरा हाल कुछ ऐसा हुआ हमदम,
तुम्हीं पर जिंदगी अपनी, तुम्हीं पर मुझे है मिट जाना.

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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र 
22-07-2015

निर्णय - लघुकथा

सड़क पर आते ही उसे लगा कि कुछ लोग उसका पीछा कर रहे हैं. उसने कंधे पर झूलते अपने बैग को संभाला और साथ चल रही बिटिया की कलाई को मजबूती से पकड़ कर क़दमों की रफ़्तार बढ़ा दी. उसने महसूस किया कि पीछा करने वालों ने भी अपनी गति और तेज कर दी. कुछ दूर लगभग दौड़ने की स्थिति में चलने के साथ ही उसने अपनी बेटी को उठाकर गोद में ले लिया. इस क्रम में उसने देखा कि पीछा करने वाले उसके ठीक पीछे आ चुके हैं. इससे पहले कि वो बेटी को संभाल कर पूरी ताकत से भाग पाती पीछा कर रहे लोगों ने उसके हाथ से बच्ची को छीन लिया.

“नहीं मैं अपनी बेटी को नहीं ले जाने दूँगी” वह चीख मारकर चिल्लाई.  

“क्या हुआ? कोई बुरा सपना देखा क्या?” बगल में सोए उसके पति ने उससे झकझोरते हुए पूछा.


वह हाँफती सी पलंग पर बैठ गई. कुछ पल में अपने को संयत कर उसने एक हाथ से पति की हथेली को थामा और दूसरा हाथ अपने पेट पर फेरती हुई बोली, “कुछ भी हो जाये, मैं एबॉर्शन नहीं करवाऊँगी.” 

मृग मारीचिका का शिकार हैं नेता जी


मृग मारीचिका का शिकार हैं नेता जी
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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नेता जी भटकाव की स्थिति में हैं या कहें कि दिग्भ्रमित से हैं. कुछ भी समझ नहीं पा रहे हैं कि करना क्या है? कैसे करना है? कब करना है? दिग्भ्रम की स्थिति इतनी विकट है कि करना कुछ चाहते हैं और कर कुछ जाते हैं. अपने इस दिग्भ्रम से न केवल वे परेशान हैं बल्कि अपने आसपास वालों को भी परेशान किये हैं. कभी गाड़ी से चल देते हैं तो कभी पद-यात्रा का की घोषणा करने लग जाते हैं; कभी दिन-रात एक करते हुए जनता जनार्दन के बीच घुसे रहते हैं तो कभी अचानक महीनों के हिसाब से गायब हो जाते हैं; कभी बड़ी-बड़ी पार्टियों की रौनक बनते हैं तो कभी मूड आते ही किसी भी गरीब की रोटी खाने पहुँच जाते हैं; कभी मजदूर के साथ खड़े होकर तसला भर-भर मिट्टी डालते हैं तो कभी खुद को किसान का हमदर्द बताने लगते हैं. इतना सब करने के बाद भी उनकी बात को कोई गंभीरता से नहीं लेता है. इसके पीछे शायद नेता जी का खुद का गंभीर न होना भी है. चूँकि राजनीति करना नेता जी का पारिवारिक शौक रहा है, इस कारण से भी नेता जी पूरी गंभीरता तो दर्शाते हैं किन्तु हास्यबोध का शिकार हो जाते हैं. लोग भी इस बात को समझते हैं कि नेता जी के परिवार ने लम्बे समय तक सत्ता सुख भोग है और खुद नेता जी ने भी जन्मते ही अपने आसपास जी-हुजूरी करने वालों की एक लम्बी फ़ौज देखी है; ‘पेटीकोट सरकार’ जैसे देशज से लेकर ‘किचेन कैबिनेट’ जैसे भयंकर शालीन शब्दों का पालन करने वालों को अपनी आज्ञा का पालन करते देखा है, इसके अलावा नेता जी जहाँ-जहाँ गए वहाँ-वहाँ भी सत्ता से दूर हो गए, ऐसे में नेता जी का व्यथित सा घूमना लाजिमी है. लोगों की उनके प्रति सहानुभूति भी है मगर सिर्फ बातों की, वोट की नहीं. नेता जी भी आये दिन चौराहों पर लोगों को रोक-रोक कर अपने नक़ल किये भाषण की पेलमपेल मचा देते हैं. व्यथितपन तथा दिग्भ्रम की स्थिति में वे कुरते की बाँह चढ़ा-चढ़ा कर बाकी दलों को, नेताओं को गरियाने लग जाते हैं. एक दिन तो वे यहाँ तक कह बैठे कि वे और उनकी पार्टी सत्ता से बाहर इस कारण हुए क्योंकि सत्ता मद में वे किसानों, मजदूरों, आम जनता के पास पहुँच नहीं पा रहे थे. अब सत्ताधारी हैं नहीं सो फुल्ली फालतू, बस निकल जाते हैं दौरे को. ऐसे में किसी ने उनके पहनावे की बात छेड़ दी तो वे चट से चिल्ला दिए कि अब तो सूट-बूट चोर भी पहनते हैं, हम असल खादीधारी परिवार के हैं इस कारण सिर्फ और सिर्फ खादी का कुरता-पाजामा धारण करते हैं. इधर नेता जी जोश में दिख रहे हैं, कई-कई मुद्दों को अपनी झोली में समेत लेने का दम भरने वाले नेता जी अबकी पवित्र नगरी से पदयात्रा करने की सनक बना चुके हैं. आखिर हनक तो बनाये रखी न जा सकी शायद सनक से ही काम चल जाए, ऐसा सोचकर नेता जी भले ही निकल रहे हैं तो पर सब जानते हैं कि वे एक बार फिर मृग-मारीचिका में भटकने वाले हैं; फिर से एक और हास्यबोध उत्पन्न करने वाले हैं.
 

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उक्त व्यंग्य जनसंदेश टाइम्, दिनांक-08-06-2015 के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.