वाह री हॉकी!!! - किसने बनाया तुमको राष्ट्रीय खेल

आज शाम को हमारे मोहल्ले के एक छोटे से बच्चे ने हमें परेशान कर डाला। दरअसल जबसे बिग-बी ने रंगीन सेल्युलाइड की दुनिया के छोटे पर्दे पर आकर लोगों को करोड़पति बनाने का कार्यक्रम शुरू किया है तबसे हमें भी बिना मेहनत के करोड़पति बनने का भूत सवार हो गया है। इसी भूत ने हमारे मिलने-जुलने वालों को, पास-पड़ोस को या यूँ कहें कि शहर के हर छोटे-बड़े को यह खबर दे दी है कि हम भी करोड़पति बनने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं।

इस खबर के बाजार में आते ही हमारे लिए किसी विज्ञापन के ऑफर आये हों अथवा न आये हों किन्तु हमारे लिए सिरदर्दी बढ़ जरूर गई है। राह चलते भी जिसे देखो उसे, हमसे ऊटपटाँग सवाल पूछकर हमारा सामान्यज्ञान जाँचने लगता है। इसी तरह के कुछ लोगों में हमारे मोहल्ले के वे छोटे उस्ताद शामिल हैं जिन्होंने हमें आज शाम को परेशान कर दिया। अभी घर से हम बाहर निकले ही थे कि उन महानुभाव ने धपाक से आकर एक सवाल जड़ दिया-‘‘चाचा, हमारा राष्ट्रीय खेल कौन सा है?’’ हमने अलल्टप्प तरीके से अपने सिर को झटका दिया और धड़ से दे मारा जवाब-‘‘क्रिकेट।’’

ये क्या, हम चारों खाने चित्त गली में पड़े थे। इस नाम का कोई राष्ट्रीय खेल होता ही नहीं है। वहाँ उपस्थित बच्चे, बड़े हमारे सामान्यज्ञान पर हँस रहे थे। हमने जवाब पूछा तो छोटे उस्ताद बोले, आप खोज लेना, आपका और भी ज्ञान बढ़ जायेगा। हमें लगा कि अब वाकई रिसर्च करनी पड़ेगी। बजाय बाजार जाने के हम वापस घर में घुसे और चिपक गये अपने कम्प्यूटर। जैसे ही इंटरनेट की दुनिया में प्रवेश किया तो अरे बाप रे! क्या चमत्कार सा दिखने लगा। जिस खेल के पीछे पूरा देश पागल है, जिस खेल में कई भगवान हैं, वो खेल हमारा राष्ट्रीय खेल नहीं। अब चौंकने की बारी और जोर से थी जब देखा कि राष्ट्रीय खेल उस खेल को बना रखा है जो शायद कभी ही किसी सामचार चैनल की शोभा बनता हो। शायद ही कभी उसका कोई मैच टी0वी0 पर दिखाया गया हो (हमने तो नहीं देखा)। शायद ही किसी समाचार-पत्र में इस खेल को प्रमुखता से छापा गया हो। शायद ही इस खेल में कोई भगवान हो।

उफ! ऐसे खेल को राष्ट्रीय खेल के रूप में स्थापित कर रखा गया है। इसके बाद इस खेल के बारे में और जानकारी एकत्र की। पता चला कि नाम है इसका हॉकीऔर इसको दो टीमों के ग्यारह-ग्यारह लोग एक साथ खेलते हैं। उँह, क्या बकवास है, एक साथ बाइस लोग मैदान में...इस भीड़ के साथ खेल होता है कि जुलूस निकाला जाता है। खैर हमें क्या, खेलो या जुलूस निकालो...हमें तो एक यही बात अच्छी लगी कि इसमें भी क्रिकेट की तरह से दोनों टीमों में ग्यारह लोग अपना खेल दिखाते हैं। बस, खेलने के तरीके पर जरा तरस आया। बाइस लोग, बाइसों के हाथ में एक डंडानुमा कोई चीज और खेलने को एक अदना सी गेंद। सब पड़े हैं इसी एक गेंद के पीछे किसी भी तरह से भागदौड़ करके एक जाली में घुसा भर देना है। ये लो हो गया गोल....क्या बकवास...चौकोर जाली में घुसा के मारा और कह दिया गोल।

एक पल को इस राष्ट्रीय खेल के बारे में और राष्ट्र में स्थापित खेल में अन्तर करने लगे। कहाँ इस खेल में सभी खिलाड़ी पसीना बहाते हुए एक ही गेंद के पीछे पड़े हैं और कहाँ दूसरी तरफ शान्ति से मैदान के खिलाड़ी और बाहर ड्रेसिंग रूम में बैठे खिलाड़ी सुस्ताये से अपना-अपना खेल खेलते हैं। यहाँ एक गेंद के लिए बाइसों को मेहनत करनी पड़ती है और वहाँ एक गेंद के लिए सिर्फ दो-तीन को ही मेहनत..एक ने गेंद से और दूसरे से बल्ले से। इसी में यदि बल्ले से लगकर कहीं चली गई तो तीसरे की मेहनत वरना पीछे खड़े-खड़े विकेट कीपर उसे पकड़ तो रहा ही है।

अब देख लो जरा खिलाड़ियों का स्तर....यहाँ बेशर्मी से हाफ नेकर पहने पूरे मैदान में दौड़ते-भागते दिखाई देते हैं अपनी टाँगों का प्रदर्शन करते। हमें लगा इसी कारण से इसके मैचों का प्रसारण टी0वी0 पर नहीं होता है। आखिर हमारे घरों में माँ-बहिनें भी हैं और इन बेशर्मों की अश्लीलता को देखने थोड़े ही बैठी हैं। दूसरी ओर क्रिकेट में देखिये....सब वेल-अप-टू-डेट। पूरी डेª, कॉलर खड़े, सिर पर कैप, गले में रुमाल, आँखों में चश्मा...मानो खेलने नहीं कहीं शॉपिंग के लिए निकले हों। देखते ही लड़कियाँ चिल्ला-चिल्ला कर आसमान सिर पर उठा लेती हैं, आखिर भारतीय महिलाओं के माफिक पूरे भारतीय पुरुष नजर आते हैं।

राष्ट्रीय खेल हॉकीके बारे में खोजते-खोजते इतना ज्ञान प्राप्त कर लिया कि हमें आसानी से भान हो गया कि आखिर इतने स्वर्णपदक जीतने के बाद भी हॉकी क्यों कोयले के ढेर में पड़ी है और रो-रोकर कुछ भगवानों के भरोसे दो विश्वकप जीतने वाली क्रिकेट में हीरे-जवाहरात लगे दिखते हैं। इसी तरह के कुछ और ज्ञान-चक्षुओं के खुलने के बाद ही हमें लगा कि हॉकी को सरकार ने कहीं आरक्षण कोटे के आधार पर तो राष्ट्रीय खेल का दर्जा तो नहीं दे रखा है, आखिर वो भी तो पिछड़ी, दलित या कहें कि पद-दलित की श्रेणी में ही दिखाई देती है।

इस बारे में और भी ज्ञान मिला...जो फिर कभी बाँटेंगे अभी इतना ही ज्ञान उन छोटे उस्ताद के साथ बाँट आयें।

इन भगवानों के लिए आँसू न बहाओ

तथाकथित भगवानों की नाकामी पर अपने आँसुओं को कुर्बान करने वाले देशभक्त भारतीय नौजवान और नवयुवतियो....इन के साथ इनके भगवानों को महिमामंडित करने वाली मीडिया के जागरूक पहरुओ...क्यों निराश हो रहे हो क्षणिक नाकामी पर? इन वीर योद्धाओं के द्वारा तो सदा से यही होता आया है। देश के बाहर निकले नहीं कि सबकी हवा टाइट हो जाती है और खेलने की बत्ती गुल हो जाती है। इससे किसी भी देशभक्त को निराश, हताश होने की आवश्यकता नहीं है।

आस्ट्रेलिया का शर्मनाक दौरा तो उसी तरह से क्षणभंगुर है जैसे कि मानव जीवन होता है फिर मीडिया ने और इनके प्रेमियों ने इन्हें मानव से ऊपर तो उठा ही दिया है। अब जबकि ये सब मानव से ऊपर हैं तो इनकी क्षणभंगुरता भी मानवीय क्षणभंगुरता से अलग ही होगी। मीडिया को बैठे-ठाले एक अवसर मिल गया है, इन पर घंटों के हिसाब से कार्यक्रम करवा कर इन पर स्यापा करने का। लानत भेजी जा रही है अब सीनियर्स की फिटनेस पर और अभी कल की ही बात है इन्हीं सीनियर्स के दम पर यही मीडिया हमें अगला विश्वकप पुनः जीतने का स्वप्न दिखा रही थी।

कोई बात नहीं, होता ही है ऐसा। अरे! हम कहते तो हैं कि गली का कुत्ता भी शेर होता है, ऐसे में यदि मीडिया और प्रशंसक घोषित भगवान अपना सर्वोत्तम आस्ट्रेलिया में नहीं दिखा पा रहे हैं तो उसका सीधा सा अर्थ है कि वो अपने घर में नहीं हैं। आज के दौर में आस्ट्रेलिया अपने घर में है और गली का कुत्ता होना को चरितार्थ कर रहा है, कल को हमारी टीम भी अपने देश में खेलेगी और इसी उक्ति को चरितार्थ करेगी।

इसके अलावा सीनियर्स को चुका हुआ मानने की अभी भी कोई वजह नहीं दिखती है। वे सब के सब तो सदा से इसी तरह का प्रदर्शन करते रहे हैं। सम्भव हो कि मीडिया को अथवा इन भगवानों के पुराने प्रदर्शनों की याद न रहती हो पर इतिहास देखा जाये तो इन भगवानों ने तो हमेशा से यही उच्चावचन का दौर दिखाया है। दसियों मैचों में गया-गुजरा प्रदर्शन करने के बाद किसी एक मैच में अच्छा प्रदर्शन करके अगले कई वर्षों के लिए टीम में जगह को घेरे रहते हैं। इनकी स्थिति ठीक उस यात्री की तरह से होती है जो भीड़ भरे प्लेटफार्म में किसी तरह से खिड़की से हाथ घुसा कर एक अदना से रुमाल के सहारे पूरी की पूरी सीट घेर लेता है और पूरी यात्रा भर उसे अपनी बपौती मानकर बाकी यात्रियों को वहाँ से टरकाता रहता है।

अरे! चलने तो दो अभी किसी एक मैच में बल्ला फिर देखना अभी इन सीनियर्स के प्रदर्शन पर थू-थू कर रहे प्रशंसक और मीडिया कैसे कूद-कूद कर इनका महिमामंडन करेगी। चिन्ता न करो हमारे हताश हो रहे रणबाँकुरो! आस्ट्रेलिया दौरा कोई आजीवन थोड़े ही चलना है कि अब हमारे भगवान वापस देश लौटकर आयेंगे ही नहीं। अरे! आने तो दो अपने देश में, खेलने तो दो अपने भगवानों के अनुकूल बनाई गई पिचों पर फिर देखना इन बुढ़ाती हड्डियों का चमत्कार और साथ में देखना मीडिया का हाहाकार, प्रशंसकों का चीत्कार। सारी धरती को अपने सिर पर उठा लेंगे...ये कहो कि इन्हें बाकी देशवासियों की जान की फिक्र होती है अन्यथा भगवानों के क्षणिक चमत्कारी प्रदर्शन के बाद मीडिया और प्रशंसक धरती ही पलट दें।

तो हे धरती पलटने की असीम शक्ति रखने वाली मीडिया और भगवान के प्रशंसको! इस तरह से इस क्षणिक नाकामी पर अपने आँसुओं को मत बर्बाद करो। देश में रोने के लिए अभी बहुत सारे मुद्दे हैं, बहुत से लोग हैं। इनका क्या है, ये जरा सी चमक दिखायेंगे और तुम सब कुछ भूल कर फिर अपनी देह रंगे घूमोगे, सड़कों पर अर्द्धनग्न डोलोगे और एक दो दिन की खुमारी के बाद फिर अपने भगवान की छीछालेदर करने पर आमादा हो जाओगे, इनकी अतिउत्कृष्ट क्षमता पर संदेह करने लगोगे। तुम सब कुछ भुलाकर सिर्फ और सिर्फ चिल्लाते रहो क्योंकि आज के भगवानों के रिटायर होने के बाद तुम सब फिर किसी और को भगवान बनाओगे, उसके लिए पहले चिल्लाओगे और किसी दिन उसकी ही छीछालेदर करते हुए उसके लिए आँसू बहाओगे।

तो हे मीडिया! हे प्रशंसको! तुम बस चिल्लाओ, हाहाकार मचाओ। तुम्हारा बनाया भगवान हर बार बदलेगा पर तुम अपना कर्तव्य न बदलो। अपना चिल्लाहट धर्म न बदलो।