नारी की बदलती छवि को दर्शाता आलेख -- कुमारेन्द्र

परिवर्तन की दिशा : नारी की बदलती छवि

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परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत सत्य है और इस सत्य का उद्घाटन समाज और उसके अंगों-अपांगों पर समय-समय पर होता रहता है। समाज का ही एक अंग होने के कारण साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। हिन्दी साहित्य ने अपने आर्विभाव से अद्यतन परिवर्तन के विविध चरणों को एकदम नजदीक से देखा और महसूस किया है। इन्हीं विविध चरणों को हम हिन्दी साहित्य में काल विभाजन की दृष्टि से स्वीकार करते हैं।

आदिकाल से लेकर अद्यानुतन चलती आ रही साहित्यिक परम्पराओं में युगकारी परिवर्तन देखने को मिले। इनमें सम्बन्धित युग की प्रवृत्तियाँ-परिस्थितियाँ स्पष्ट रूप से साहित्य को प्रभावित करती रही हैं। प्रत्येक युग की प्रवृत्तियाँ भी तत्कालीन युग के परिवर्तन को इंगित करती रहीं हैं और स्वयं को युगीन बोध के अनुसार परिवर्तित भी करती रही हैं।

आधुनिक काल के साहित्य पर दृष्टिपात करें तो स्पष्ट होता है कि इस कालखण्ड में परिवर्तन की दिशाएँ विविध एवं तीव्रतम रहीं हैं। स्वतन्त्रता आन्दोलन के युग में उत्पन्न हुई साहित्यिक एवं सामाजिक चेतना ने परिवर्तन की दिशा निर्धारित की। इस युग के साहित्य ने पूर्व साहित्य के इतर मानवीय संवेदनाओं को इंगित करने वाली परम्परा पर विशेष बल दिया। मानवीय संवेदनाओं और युगीन बोध ने साहित्य को बँधी-बँधाई परिपाटी से परिवर्तित कर एक नई दिशा प्रदान की।

मनोरंजन, ऐयारी, जासूसी साहित्य सर्जना से इतर मानवीय संवेदनाओं और क्रिया-कलापों को केन्द्र में रखकर साहित्य-रचना ही जा रही थी। तत्कालीन युग-बोध को दर्शाने के साथ-साथ स्त्री को भी साहित्य के केन्द्र में रखा जाने लगा था। अब स्त्री को प्यार की जागीर, उसे दासत्व जैसी स्थिति में देख साहित्यकारों को भी पीड़ा का एहसास हो रहा था। नारी अब मात्र बिलासिता और नख-शिख सौन्दर्य की वस्तु नहीं रह गई थी। साहित्य के द्वारा स्त्रियों की दशा का चित्रण कर उनके समाधान का आधार भी निर्मित किया जा रहा था। राजा राममोहन राय, महर्षि कर्वे, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, दयानन्द सरस्वती जैसे समाज-सुधारकों के प्रयासों के परिणामस्वरूप लाला श्रीनिवास दास, श्रद्धानन्द किल्लौरी, बालकृष्ण भट्ट, किशोरीनसन गोस्वामी, भारतेन्दु हरिश्चन्द आदि जैसे साहित्यकार अपनी रचनाओं के द्वारा नारी-शिक्षा, नारी समस्या उन्मूलन जैसे विषयों को सामने ला रहे थे। इस युग में सामाजिक उपन्यासों के द्वारा जुआ, शराब, वेश्या-नृत्य, चाटुकारिता आदि बुराइयों का पर्दाफाश कर समाज को सही राह पर चलने की दिशा दी जा रही थी।

स्वाधीनता आन्दोलन में स्त्रियों की सशक्त भूमिका ने साहित्य में भी स्त्रियों की भूमिका को परिवर्तित किया। नारी-शिक्षा को लेकर रचे जा रहे ग्रन्थों से परिवर्तित होकर साहित्य की दिशा नारी के बंधनों को तोड़ने की दिशा में बढ़ गई। द्विवेदी युग में राष्ट्रवादी कवयित्री राजरानी देवी ने राष्ट्र की स्वतन्त्रता के साथ-साथ स्त्री स्वतन्त्रता की भी आवाज उठाई।

राजरानी देवी ने स्त्री को किसी भी प्रकार के बंधनों में न बँधकर स्वतन्त्र बनने का संदेश दिया। वे स्त्रियों का आहवान भी करती हैं-
‘सोच लो, संसार के कांतार में,
बद्ध होकर यदि जिए तो क्या जिए?
कर्म के स्वच्छन्द, सुखमय क्षेत्र में,
किंकिणी के साथ भी तलवार हो।’

इसी युग में नारी स्वयं भी लेखन के द्वारा अपनी समस्याओं और उनके समाधान को खोजती नजर आई। बंग महिला (राजेन्द्र बाला घोषा) की कहानी ‘दुलाईवाली’ को हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी स्वीकारना महिला सशक्तीकरण की आधारभूमि तैयार करना ही था। इस कहानी में स्त्रीचेतना और स्त्री सरोकार को एक स्त्री की दृष्टि से ही दिखा कर स्त्री की भूमिका को प्रतीकात्मक ढंग से सशक्त रूप में दर्शाया गया था। बंग महिला द्वारा साहित्य लेखन को इस कारण से भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है कि इस समय गोपालदास गहमरी और देवकीनन्दन खत्री जैसे स्थापित पुरुष साहित्यकार साहित्य-सर्जना कर रहे थे वहाँ बंग महिला ने नारी-सुधार जैसे विषय को केन्द्र बना कर लिखी कहानी से स्त्री चेतना और सशक्तीकरण की दिशा तय की।

नारी-शक्ति लगातार साहित्य-सर्जना की ओर प्रवृत्त हो रही थी। यशोदा देवी, प्रियंवदा देवी, शारदा देवी जैसी लेखिकाओं ने महिला शक्ति को, अस्तित्व को स्वर प्रदान किया। समय परिवर्तित होता रहा, प्रवृत्तियाँ लगातार बदलती रहीं और इसी परिवर्तन के साथ-साथ स्त्री चेतना के स्वरों में भी परिवर्तन होते रहे। सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ देने के आहवान, बंधनों से मुक्ति के प्रयासों को मुखरता महादेवी वर्मा के आने से मिली। छायावादी सात्विक नारी प्रेम की भावना से इतर महादेवी वर्मा ने नारी-स्वर को ओज देकर ‘स्त्री-विमर्श’ की स्थापना हिन्दी साहित्य में की। प्रसाद की नारी की उज्ज्वल, पावन छवि के साथ-साथ जो सामाजिक स्थिति बनी इस छवि की दीनता और असहायता की स्थिति को निराला ने ‘विधवा’ तथा ‘तोड़ती पत्थर’ जैसी रचनाओं के द्वारा दर्शाया। इन्हीं के समकालीन पन्त नारी को भोग का साधन अथवा वासना तृप्ति का साधन मात्र न स्वीकार कर उसे भी एक मानवीय स्वरूप प्रदान करते दिखे।

महादेवी वर्मा ने नारी की इन परम्परागत छवियों से अलग सशक्त चरित्र, जीवट व्यक्तित्व एवं स्वतन्त्र अस्तित्व छवि का निर्माण किया। महादेवी वर्मा ने परिवार और समाज के बंधनों में सिर्फ नारी के बँधने का विरोध किया। परिवार और समाज के इन बंधनों का विरोध करती हुईं वे ‘पथ के साथी’ में कहती भी हैं- ‘‘समाज और परिवार व्यक्ति को बंधन में बाँधार रखते हैं। ....ये बंधन व्यक्तित्व के विकास में सहायता करने के बदले बाधा पहुँचाते लगते हैं। ये बंधन कितने ही अच्छे उछ्देश्य से क्यों न नियत किये गये हों, हैं बंधन ही और जहाँ बंधन है वहाँ असंतोष तथा क्रांति है।’’ महादेवी वर्मा इसी क्रांति की ज्वाला ‘शृंखला की कड़ियाँ’ कृति के द्वारा तत्कालीन नारियों के मघ्य प्रज्ज्वलित करतीं हैं।

लगातार होते साहित्यिक परिवर्तनों ने नारी के व्यक्तित्व को स्वतन्त्रता प्रदान की। इस स्वतन्त्रता ने स्त्री को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के साथ-साथ सामाजिक-पारिवारिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक स्वतन्त्रता प्रदान की। नारी की स्वतन्त्रता मुखर होकर साहित्य में नवीन दिशाओं का निर्माण करती दिखी। सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति, आराधना योग्य देवी की स्वीकार्य छवि से इतर वह उच्छृंखल छवि का निर्माण करने लगी। परम्पराओं और मूल्यों के बंधनों को तोड़कर वह ‘बोल्ड’ लेखन ओैर ‘बोल्ड’ चरित्र प्रदर्शित करने लगी। मानसिक-शारीरिक-यौनिक स्वतन्त्रता ने यद्यपि नारी छवि को परम्परागत भारतीय नारी छवि से अलग पहचान दी साथ ही साथ इस छवि को आरोपित भी किया। इन सबके बाद भी वह अपनी बेलाग, बेलौस, स्वच्छन्द छवि से साहित्य में नवीन प्रवृतियों और दिशाओं को जन्मने लगी।

नया कालखण्ड, नया युगबोध और स्त्री-चरित्र को लेकर स्थापित होती नई परिवर्तनकारी अवस्थाओं ने स्त्री-चेतना को स्वच्छन्द यौनिक अवस्था में परिवर्तित कर दिया। अब नारी साहित्य के द्वारा सोचती है कि पुरुष वेश्यालय कब खुलेंगे? उसके नारी पात्र एक साथ कई पुरुषों की शारीरिक शक्ति का परीक्षण करने लगे। अपनी विशिष्ट दैहिक संरचना की स्वीकारोक्ति से अपने अंगों-उपांगों के चित्रण और उनकी सौन्दर्यानुभूति को स्वयं प्रदर्शित करने लगी। माँग के सिन्दूर, सिर के आँचल, पैरों की पायल-बिछिया, व्रतों-त्योहार का बहिष्कार सा कर स्वतन्त्र नारी ने स्वतन्त्र अस्तित्व की अवधारणा निर्मित की। साहित्य सर्जना करती नारी, उसके नारी-पात्र स्वतन्त्र यौन सम्बन्ध्ाों को बनाने में, सेक्स पार्टनर बदलने में, विवाहेत्तर अथवा विवाहपूर्व शारीरिक सम्बन्धों को बनाने में, अनब्याही माँ बनने में, अविवाहित जीवन व्यतीत करने में किसी तरह का अपराध-बोध नहीं स्वीकारते हैं। स्वीकारें भी क्यों, आखिर साहित्य की परिवर्तित होती दशाओं और दिशाओं ने स्त्री को स्वतन्त्र मानवीय पहचान प्रदान की है।

नारी की परिवर्तित छवि से, उसकी स्वतन्त्र, स्वच्छन्द, उच्छृंखल मानसिक सोच से सामाजिक संरचना, पारिवारिक संरचना, सामाजिक सरोकारों, जीवन-मूल्यों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, यह अलग से चिन्तन का विषय है। परिवर्तन की दृष्टि से नारी की परम्परागत छवि का विखण्डित होना रूढ़ियों, सड़ी-गली मान्यताओं, पुरुषजन्य विकृत सोच को परिवर्तित करता है। यह कहीं न कहीं स्वस्थ समाज के निर्माण का कार्य भी करता है।

भोजपुरी लोकगीतों का माधुर्य -- आलेख

भोजपुरी लोकगीतों का माधुर्य
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‘लोक’ शब्द अपने आप में ही विशालता का अनुभव कराता है। वर्तमान में ‘लोक’ को अंग्रेजी के ‘फोक’ से जोड़कर उसके अर्थ को संकुचित करने का प्रयास किया जा रहा है। भारतीय संस्कृति में लोक को हमेशा से ही विशेष स्थान प्राप्त रहा है। इसको त्रिलोक -पृथ्वी, आकाश, पाताल- के रूप में देखा और समझा जा सकता है।

‘लोक’ की महत्ता और सौन्दर्य का परिपाक लोकगीतों में आसानी से होता है। देश की संस्कृति में लोकजीवन का विशेष महत्व रहा है और इसी महत्ता के चलते लोकगीतों ने भी विशेष भाव प्राप्त किया है। देश का कोई भी भू-भाग रहा हो, कोई भी सांस्कृतिक विरासत रही हो, कोई भी भाषा, धर्म, जाति रहे हों, लोकगीतों ने सभी को परे रखकर अपने माधुर्य से समूचे देश का मन मोहा है।

भोजपुरी लोकगीतों में भी कुछ ऐसा ही माधुर्य दिखलाई और सुनाई देता है जो इस भाषा के गैर-जानकारों को भी मंत्र-मुग्ध करता है। इन लोकगीतों में जीवन के किसी एक पक्ष की नहीं वरन् समूची मानस परम्परा की अनुभूति होती दिखाई देती है। लोकगीत मानव-मन की सरल और सहज अभिव्यक्ति होते हैं और यही सहजता, सरलता आमजन को प्रभावित किये बिना नहीं रहती है।

यह सत्य है कि किसी भी देश की, समाज की सभ्यता और संस्कृति से परिचय वहाँ की भाषा से होती है किन्तु इसमें भी कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि लोकगीतों के माध्यम से भी किसी क्षेत्र की, समाज की, भाषा की संस्कृति को देखा-परखा जा सकता है। भोजपुरी को आमतौर पर एक क्षेत्र विशेष की, एक अंचल विशेष की भाषा कहा जाता है। इसे लोकभाषा के रूप में भी पहचान प्राप्त है। इसके बाद भी इस भाषा का विस्तार देश के प्रत्येक राज्य में होने के साथ-साथ विदेशों तक में है। इसके पीछे शायद इस भाषा का माधुर्य और लालित्यपूर्ण होना रहा है। प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा ने कहा भी है-‘‘भोजपुरी सशक्त लोकभाषा है तथा उसमें भारत की धरती की उर्वरता और उसके आकाश की व्यापकता एक साथ मिल जाते हैं।’’

इसी धरती और आकाश की एकात्मकता पैदा करने की शक्ति भोजपुरी लोकगीतों में है। वाचिक परम्परा में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होकर आते लोकगीतों के संरक्षण-संवर्द्धन का कार्य लोक-परम्पराओं के द्वारा होता रहता है। आम जीवन में होने वाले कार्यों, धार्मिक अनुष्ठानों, वैवाहिक संस्कारों आदि में लोकगीतों का गायन होता रहता है। लोकवाणी के रूप में ख्यात लोकगीतों को लोकसंस्कृति और लोकला के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। लोकगीतों से व्यक्ति का रागात्मक सम्बन्ध होने के साथ-साथ संस्कारगत् सम्बन्ध भी होता है। यही कारण है कि भाषा-शैली, बोली, गायन की भिन्नता होने के बाद भी लोकगीत प्रत्येक व्यक्ति को झूमने पर मजबूर कर देते हैं।

भोजपुरी लोकगीतों में लोकजीवन, संस्कारों मात्र की झाँकी ही नहीं दिखती अपितु उसमें राष्ट्रीय चेतना, नारी स्वाभिमान, आम जन-जीवन के दृश्य, धार्मिक अनुष्ठान आदि के साथ-साथ सामाजिक संदेश भी दिखाई देते हैं। मानव-मन की संवेदनशीलता और उसकी कल्पना की उड़ान धरती से लेकर आकाश की ऊँचाइयों तक जा सकती है। परम्पराओं का उद्वेग उनमें हो सकता है, मानवीय क्रियाकलापों का प्रतिबिम्ब भी दृष्टिगोचर हो सकता है। इन लोकगीतों ने विशुद्ध रूप में मानवीय मन को, क्रियाकलापों को अपने में संजोया है।


राष्ट्रीय चेतना

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भोजपुरी लोक-साहित्य राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत है और इसकी प्रतिच्छाया लोकगीतों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। अंग्रेजी शासन की यातना और बर्बरता से सभी का हृदय द्रवित हो उठता था। इस क्रूर शासन के विरुद्ध संघर्ष करने वालों में सभी वर्गों के लोग शामिल थे। क्या निर्धन, क्या धनवान, निरक्षर, साक्षर, मजदूर, किसान, छात्र, नौकरीपेशा आदि-आदि सभी किसी न किसी रूप में राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत देश-प्रेम की लहर में बह रहे थे। इस राष्ट्रीय चेतना का संचार करने में लोकगीतों की महती भूमिका कही जा सकती है। इन लोकगीतों में आमजन का दुख स्पष्ट दिखलाई देता है-

‘अपने देष के करनवा जेकि जूझि गइले ना।
केतने माई के ललनवा हाय, मरि गइले ना।।’

राष्ट्रीय चेतना का उत्स इसी को कहा जायेगा कि पुरुष और युवा ही इस आन्दोलन में सक्रियता से नहीं जुड़ा रहा था। महात्मा गाँधी का जनोत्थान और जन जागरण सभी के मध्य फैल चुका था, परिणामतः घर की महिलाएँ भी इस आन्दोलन में स्वयं को पीछे नहीं रखना चाहतीं थीं। गाँधीजी की चरखा क्रांति ने कैसे महिलाओं को जागरूक किया, इसकी एक बानगी भर है यहाँ-

‘चरखा कातो मानो गाँधीजी की बतिया।
विपतिया कट जइहै ननदी।
करे तू सूत जौन तइयार ले जाये स्वदेषी भंडार।
बेच के पइसा लेके खायें दुनों बखतिया।’

स्वतन्त्रता आन्दोलन में स्त्रियों का महती योगदान रहा है। उन्होंने न केवल अपने पतियों को इस अभियान से जोड़ा था वरन् पूरे परिवार के साथ मिलकर स्वाभिमान के साथ इस आजादी के यज्ञ में आहुति दी थी। नारी ने आजादी की लड़ाई को अपने स्वाभिमान से जोड़कर अपनी सक्रियता से स्वराज पाने की लालसा रखी थी-

‘अब हम कातबि चरखवा पिया जानि जा हो विदेसवा।
हम कातबि चरखा तुहूं लावइ मिलिहें एही से सुरजवा।’

राष्ट्रीय चेतना का विकास इस स्तर तक रहा कि महिलाओं ने विवाह गीतों तक को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ कर लोकगीतों का गायन कर डाला। लोकगीतों के संरक्षण और संवर्द्धन में महिलाबों का बहुत बड़ा योगदान होता है। इन्हीं के कंठों से निकल कर लोकगीत जनमानस के बीच अपनी उपस्थिति दजै करवाते हैं। विवाह के विविध संस्कारों में राष्ट्रीय चेतनायुक्त लोकगीतों का माधुर्य आज भी दिखाई देता है। इसी तरह भोजपुरी के क्रांतिकारी बाबू रघुवीर नारायण सिंह का ‘बटोहिया गीत’ आज भी अपनी हनक और धमक के साथ मौजूद है और लोकगीतों की राष्ट्रीय भावना को प्रखरता प्रदान करता है-

‘सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से, मोरे प्रान बसे हिम-खोह रे बटोहिया।
एक द्वार घेरे राम हिम-कोतवलवा से, तीन द्वार सिंधु घहरावे रे बटोहिया।
जाहु-जाहु भैया रे बटोही हिन्द देखि आउ, जहवाँ कहुँकि कोइलि बोले रे बटोहिया।

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द्रुम वट पीपल कदम्ब निम्ब आम वृक्ष, केतकी गुलाब फूल-फूले रे बटोहिया।
सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से, मोरे प्रान बसे गंगा धार रे बटोहिया।’

राष्ट्रीय चेतना का ओज और जोश लोकगीतों में आसानी से दिखाई देता है। इनकी वीरता और क्रांतिकारी कदम किसी से भी छिपे नहीं हैं। जॉर्ज ग्रियर्सन ने भोजपुरी लोगों की प्रशंसा करते हुए लिखा है, भोजुपरी वाले साहसी कार्य करने हेतु उत्सुक रहते थे। जिस प्राकर आयरलैण्ड के लोग छड़ी के शौकीन हैं, उसी प्रकार हृष्ट-पुष्ट भोजपुरी लोग अपने घर से दूर अपने हाथों में लाठी लिए खेतों में काम करते हैं। लोक-संस्कृति में एक आम धारणा है चलन में है कि हिदुस्तान का यश-वैभव, वीरता-ओज, सम्मान बढ़ाने का काम बंगालियों ने अपनी कलम से किया है तो वीर भोजपुरियों ने अपने डण्डे से। भोजपुरी लोकगीतों में आज भी इस क्षेत्र की वीरता और अक्खड़पन के दृश्य आसानी से देखने-सुनने को मिल जाते हैं-

‘भागलपुर का भगेलुआ, कहल गाँव का ठग्ग।
जो पावै भोजपुरिया, तोडै दोनों का रग्ग।।’

इसी तरह अक्खड़ता को कुछ इस अंदाज में भी व्यक्त किया जाता है-

जे हमरा का जानी, ओकरा जान देइ देबि,
बाकिर जे आँख देखाई, ओकरा आँख निकालि लेबि।’


जन-जीवन की अभिव्यक्ति

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जन सामान्य हमेशा से सफल जीवन के लिए संघर्ष करता रहा है। इस संघर्ष में उसने कभी विजय प्राप्त की है तो कभी उसको हताशा हाथ लगी है। ऐसी संघर्ष की स्थितियाँ हर व्यक्ति के जीवन में आतीं रहीं हैं। इन स्थितियों, परिस्थितियों से आम आदमी दो-चार हुआ है तो उसकी अभिव्यक्ति उसने लोकगीतों में भी की है। लोकगीतों के माध्यम से व्यक्ति ने अपने हर्ष-उल्लास को दर्शाया है तो अपनी समस्याओं और विपदाओं को भी आवाज बनाकर सभी के सामने प्रस्तुत किया है। भोजपुरी लोकगीतों में यह विशेषता देखने को मिलती है कि राष्ट्रीय चेतना के स्वर दिखे हैं तो धार्मिक अनुष्ठान, पर्व आदि का उल्लास भी दिखा है। इसके साथ-साथ यहाँ के लोकगीतों में जन सामान्य की कठिनाइयाँ भी दिखाईं दीं हैं।

किसानों की समस्या हो, अलित जीवन की समस्या हो, सामंती व्यवस्था का विरोध हो, महिलाओं की करुष कथा हो सभी को लोकगीतों में स्थान दिया गया है। एक किसान की विपत्ति और दुख को स्वर देते यहाँ के लोकगीत दिखते हैं-

‘अपना जंगरवा के खाले जे कमइया
सगरे जगतिया के बाड़े जे सहइया
धरती के पुतवा के बजर करेजवा
कि सहि जाले विपत्ति अपार।’

दलितों के दुख और कष्ट को भी लोकगीतों के माध्यम से बखूबी स्वर दिया गया है। लोक से जुड़े होने के कारण लोकगीतों में आम जन की आवाज सुनाई देनी सम्भव भी है। भले ही समाज के सामने दलितों को स्वर न मिला हो किन्तु लोकगीतों ने उनके स्वर को अपना गायन देकर समूचे समाज के सामने प्रदर्शित किया है-

‘हमनीं के राति दिन दुखबा भोगत बानी,
हमनीं के साहेबे से मिनती सुनाइबि।

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पनहीं से पिटि हाथ गोड़ तुरि देलै,
हमनी के एतनी काहे के हलकानी।।’


नारी चित्रण

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लोकगीत मानव-मन की सहज और सरल अभिव्यक्ति होते हैं। इनमें सुख-दुख, हास्य-करुणा, हर्ष-उल्लास आदि आसानी से देखने को मिलते हैं। लोकगीतों के सौन्दर्यमयी चित्रण में महिलाओं का विशेष योगदान रहा है। नारी चित्रण को इस कारण से भी लोकगीतों में स्थान दिया गया है। नारी को भारत देश में पावन और सर्वोच्च स्थान प्रदान है। इसी के चलते उसका स्वाभिमानी स्वरूप हो अथवा उसका प्रेममयी रूप, सभी का चित्रण लोकगीतों में आसानी से देखने को मिलता है। सहनशीलता की प्रतिमूर्ति मानी गई नारी के स्वाभिमान पर जब भी चोट लगी है उसने उसका प्रतिकार किया है।

भोजपुरी लोकगीतों में नारी स्वाभिमान का चित्र राम-सीता के रूप में दिखाने का प्रयास किया जाता रहा है। राम-सीता के रूप को आधार बनाकर लोकगीतों में राम के द्वारा निष्कासन को सीता द्वारा क्षमा न किया जाना, राम के सामने न आना, आत्मसम्मान के लिए स्वयं को विसर्जित कर देने जैसी भावनाओं से यहाँ के लोकगीत सजे-सँवरे दिखाई देते हैं।

इसे एक उदाहरण के रूप में कुछ इस तरह से देखा जा सकता है-

‘अइसने पुरुखवा के मुँह नाही देखबों, मिनिराम देले वनवास रे।
फटि जइती धरती अलोप होइ जइती, अब ना देखबि संसार रे।।’

इस करुणा के अलावा नारी का माता रूप भी करुणामयी माना जाता रहा है। एक माता के लिए यह बहुत ही कष्टकारी होता है कि उसके बच्चे मजदूरी करते रहें, उनका शोषण होता रहे, बिना पढ़े-लिखे ही रह जायें। ऐसे में एक माँ का कष्टों भरा दिल अपने बच्चों के लिए सिसक उठता है-

‘हमसे ना होई बनिहरिया ऐ मालिक। हमसे ना होई.....
अपना लरकवा के इसकूल भेजाइला।
हमरा लइकवा से भँइस चरवाइला।
बन माँगे जाइका ज खंखरी तउलाइला।
ओह पर कम का पसेरिया ए मालिक। हमसे ना होई....’

नारी मन अपने सभी सगे-सम्बन्धियों का भला चाहती है। संवेदनशीलता उसमें कूट-कूट कर भरी होती है। इसी संवेदनशीलता को नारी प्रकृति में भी आरोपित करती दिखती है। बादलों की फुहार हो अथवा मौसम की गर्माहट, सावन के झूलों का झूलना हो अथवा फाग के रंगों में मन का मचलना, सभी में नारी मन ने लोकगीतों की रचना कर अपनी खुशी को प्रदर्शित किया है। आकाश में छाते जा रहे काले-काले बादलों को देखकर एक महिला अपनी सहेली से उसकी बहार देखने के लिए बगीचे में चलने की जिद करती है। सावन की बारिश महिलाओं को हमेशा से लुभाती रही है। इसी कारण से बारिश शुरू हो नहीं पाई है और सखियाँ बगीचे में जाने का अवसर खोजने लगीं हैं-

‘चिड़िया चली चल बगइचा
देखत सावन की बहार
देखत फूली को बहार
सावन में फूले बेइला चमेली
भादों में कचनार
चिड़िया चली चल बगइचा।’

ऐसे मौसम में महिलाएँ अपने प्रियतम को अपने साथ ही चाहतीं हैं। भोजपुरी लोकगीतों में संयोग और वियोग के सुंदर दृश्यों का समावेश किया गया है। बाग-बगीचों में झूलों के हिंडोले, अपने प्रिय से मिलने की आस, किसी के प्रियतम का पास न होने पर उस नारी का दुख आदि को लोकगीतों में स्वर दिया गया है। वर्षा होने पर भी पति का न आना पत्नी को परेशान करता है और उसके वियोग के इस भाव को लोकगीतों में कुछ इस तरह से व्यक्त किया गया है-

‘बादर बरसे बिजुरी चमके, जियरा ललचे मोर सखिया।
सैंया घरे ना अइलैं, पानी बरसन लाग मोर सखिया।।’

महिलाओं की अपने प्रिय से विरह की स्थिति के साथ-साथ अपने किसी प्रियजन से भी बिछोह की स्थिति को भोजपुरी लोकगीतों में दर्शाया गया है। भाई-बहिन के आपसी स्नेह और किसी विशेष अवसर पर किसी एक की कमी दूसरे को रुला देती है। ऐसे ही एक बहिन अपनी बेटी की शादी के समय अपने भाई का इंतजार करती है और भाई के न आने पर दुखी भी हो जाती है। इस दुख में वह रोते-रोते कहती है-

‘ढरि-ढरि बरसे पुतरिया
दुवरिया पर कब अइब बिरना।
ताना मारी सगरो जवरिया
दुवरिया कब अइब बिरना।।’


सामाजिक संदेश
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भोजपुरी लोकगीतों में इसके अतिरिक्त हमें सामाजिक संदेश भी दिखाई देते हैं। इन सामाजिक संदेशों में विशेष रूप से पर्यावरण संरक्षण के प्रति जोर दिया गया है। वृक्षों को विविध कार्यों से जोड़कर उसको पूज्य बना देने की भारतीय संस्कृति का अनुपालन इन लोकगीतों में होता भली-भाँति दिखता है। पेड़ों के महत्व को ध्यान में रखते हुए कहीं उसके द्वारा पुत्र प्राप्ति की कामना की जाती है तो कहीं उसके द्वारा लक्ष्मी की आराधना की जाती है। पेड़-पौधों में तुलसी की उपयोगिता को पहचान कर उसके विवाह की परम्परा यहाँ के अंचल में पाई जाती है। इस विवाह का मुख्य उद्देश्य तुलसी की उपयोगिता को देखते हुए उसे घर-घर तक प्रतिष्ठित करना है।

इसी तरह अन्य दूसरे वृक्षों में किसी न किसी देवता का वास दिखाकर उसको महत्वपूर्ण बना दिया है। पीपल में लक्ष्मी जी का वास बताकर विभिन्न लोकगीतों के माध्यम से पीपल की आराधना, पूजा करते दिखाया गया है-

‘पीपल सींचन मैं गई, अपने कुल की लाज।
पीपल सींचा कहि मिले, एक पंथ दो काज।।’

पीपल के अतिरिक्त अनार, नीबू, जामुन, महुआ आदि का सुरक्षा और पर्यावरण की दृष्टि से भी लोकगीतों में समावेश किया गया है। विभिन्न लोकगीतों में इन वृक्षों के नामों का उल्लेख साबित करता है कि यहाँ का जनमानस वृक्षों की सुरक्षा के प्रति, पर्यावरण के प्रति कितना सचेत है-

‘टूटी फूटी बँसवा सं निकली महारानी,
हो कि बेइलिया तरे ना,
कल्ली अपनो बसेड़ वा,
हो बेइलिया तरे ना।’

लोकसंस्कृति में हमेशा से पर्यावरण को महत्व दिया जाता रहा है। इसी कारण से भोजपुरी लोकगीतों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता का भाव दिखाई देता है। मनुष्य और वृक्षों का अपसी तालमेल, वृक्षों में देवताओं का वास, वृक्षों के द्वारा मनोकामना पूर्ण होने की परम्परा का पालन आदि सभी कुछ पेड़-पौधों के प्रति प्रेम को दर्शाता है।

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भोजपुरी लोकजीवन में विशालता और विशदता देखने को मिलती है। लोक-संस्कृति के इस स्वरूप को लोकगीतो के माध्यम से आसानी से देखा-सुना जा सकता है। सामाजिक जीवन का चित्रण हो, पारिवारिक प्रेम-स्नेह का चित्रण हो अथवा आपसी सम्बन्धों-रिश्तों की चुहल सभी को यहाँ के लोकगीतों में विशेष रूप से दर्शाया गया है। लोक का सम्बन्ध चूँकि आम जन से रहा है इस कारण आमजन से सम्बन्धि विविध पक्षों का उद्घाटन भी इन लोकगीतों में होता दिखता है। लोक की सर्वहितकारी भावना, सर्वजन सुखाय की भावना लोकगीतों में प्रचुरता से देखने को मिलती है। हृदय की अनुभूतियों को वातावरण और परिस्थितियों से तादाम्य स्थापित कर जनमानस के बीच फैलाने का कार्य लोकगीतों में आसानी से हुआ है। इस प्रयास में भोजपुरी लोकगीत भी किसी से कमतर नहीं दिखते हैं। इन लोकगीतों का लालित्य और माधुर्य ही है जो सभी को बरबस अपनी ओर आकर्षित करता है। अपने गायन पर झूमने पर मजबूर करता है।