गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

पहचान के साथ ही... [कविता--कुमारेन्द्र]

कविता --- पहचान के साथ ही...


अपराध करने के बाद भी
अपराध-बोध का
तनिक भी भान नहीं,
नहीं एहसास कि
वह अपने हाथों से
मिटा चुका है एक सृष्टि को,
वो हाथ जो
झुला सकते थे झूला,
दे सकते थे थपकी,
सिखा सकते थे चलना,
जमाने के साथ बढ़ना,
उन्हीं हाथों ने
सुला दिया मौत की नींद,
मिटा दिये सपने,
अवरुद्ध कर दिया विकास,
बिना उसकी आंखें खुले,
बिना उसके संसार देखे,
बिना अपना परिवार जाने,
समाप्त हो गया उसका अस्तित्व,
समाप्त हो गया एक जीवन,
मिट गई एक मुस्कान
क्योंकि
समाज में आने के पूर्व ही
समाज के कथित ठेकेदार
कर चुके थे उसकी पहचान।

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चित्र गूगल छवियों से साभार

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