सन्देश का प्रभाव -- व्यंग्य कविता -- कुमारेन्द्र

व्यंग्य कविता --- सन्देश का प्रभाव
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सड़क पर पड़े

घायल को देख कर
कतरा कर, आँखें बचाकर
निकलते लोग।
याद आता है
मानवता का संदेश
पर....
सहायता के लिए
बढ़े कदमों को,
विचारों को
रोक देते हैं
नगर के किसी
‘विशेष इमारत’ के सामने लगे
‘बोर्ड़ों’ के ‘संदेश’
‘पुलिस आपकी मित्र है’
सदैव
‘आपकी सेवा’
को तत्पर।

जमाने का चलन -- ग़ज़ल -- कुमारेन्द्र

जमाने का चलन -- ग़ज़ल



अपने दर्द को हँस कर छिपा रहे हैं।

आँखों से फिर भी आँसू आ रहे हैं।।

जिनसे निभाया न गया दोस्ती को।
वही अब हमसे दुश्मनी निभा रहे हैं।।

हाथ छलनी किये तराशने में जिन्हें।
वो पत्थर के खुदा आँखें दिखा रहे हैं।।

जोश दिल में है जमाना बदलने का।
तभी आँधियों में चिराग जला रहे हैं।।

मिला नहीं सकते जो नजरें हकीकत में।
अपने ख्वाबों में वो हमें मिटा रहे हैं।।

नहीं सुकून उन्हें हमारी खुशियों से।
प्यार के नाम पर जहर पिला रहे हैं।।

आए जो भी दिल के करीब हमारे।
जख्म पर जख्म ही दिये जा रहे हैं।।

छोड़ कर मुश्किलों में चले गये मगर।
अपने को हमारा हमसफर बता रहे हैं।।

क्या कहें जमाने के इस चलन को।
मौत से डरने वाले जीना सिखा रहे हैं।।


चित्र गूगल छवियों से साभार

ग़ज़ल -- दुनिया तो सजाओ यारो -- कुमारेन्द्र

ग़ज़ल -- दुनिया तो सजाओ यारो




ऊपर वाले की दुनिया को यूं न मिटाओ यारो।
रिश्ता इससे है कुछ तुम्हारा भी वो निभाओ यारो।।

हम न होंगे कल को मगर ये दुनिया तो होगी।
आने वालों के लिए ही ये दुनिया तो सजाओ यारो।।

कोई मन्दिर है बनाता, मस्जिद बना रहा है कोई।
पर दिलों के बीच तुम दीवार तो न बनाओ यारो।।

नफरत बढ़ा रहे हैं सभी स्वार्थ में अंधे होकर।
तुम तो इस धरती से मुहब्बत न मिटाओ यारो।।

अपने लिए तो इस जहां में सभी जी लेते हैं।
कभी औरों के लिए भी मर के दिखाओ यारो।।

दोस्ती करना आसान है पर है निभाना मुश्किल।
छोड़ कर यार को मझधार में तो न जाओ यारो।।

जिन्दगी का साथ सदा के लिए मुमकिन ही नहीं।
काम कुछ ऐसे करो कि कल को याद तो आओ यारो।।

क्या पता एक तुम ही जमाने को बदल डालो।
अपने को भलाई की राह में आगे तो लाओ यारो।।

करने को रोशन ये जहां एक चिराग ही काफी है।
उसी की खातिर तुम तूफान से तो टकराओ यारो।।

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चित्र गूगल छवियों से साभार