जीवन जीने को आया हूँ --- कविता -- कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

कविता - जीवन जीने को आया हूँ
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(ये हैं हमारे स्टायलिश भांजे)
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फिर जिन्दा होकर लौटा हूँ, मैं आज तुम्हारी नगरी में।
जीवन जीने को आया हूँ, मैं आज तुम्हारी नगरी में।।
अपनों को जाते देखा है,
गैरों को आते देखा है,
दुःख की तपती धूप है देखी,
सुख का सावन देखा है,
सतरंगी मौसम लाया हूँ, मैं आज तुम्हारी नगरी में।
जीवन जीने को आया हूँ, मैं आज तुम्हारी नगरी में।।
जीवन से जो जीत गया,
मौत को उसने जीता है,
कर्म हो जिसका मूल-मंत्र,
वह जीवन-पथ पर जीता है,
जीवन-विजय सिखाने आया हूँ, मैं आज तुम्हारी नगरी में।
जीवन जीने को आया हूँ, मैं आज तुम्हारी नगरी में।।
जीते कभी समुन्दर से,
कभी एक बूँद से हार गये,
उड़े आसमां छूने को,
पहुँच आसमां पार गये,
चाँद-सितारे लाया हूँ, मैं आज तुम्हारी नगरी में।
जीवन जीने को आया हूँ, मैं आज तुम्हारी नगरी में।।


(इनकी तो अपनी ही स्टायल है)


7 comments:

  1. जीवन से जो जीत गया,
    मौत को उसने जीता है,
    कर्म हो जिसका मूल-मंत्र,
    वह जीवन-पथ पर जीता है,
    कितना सुन्दर जीवन सन्देश है
    शानदार रचना

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  2. बेहद उम्दा रचना।
    कल (26/7/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  3. क्या बात है एकदम गज़ब कर दिए. बहुत ही सुन्दर बहुत ही सुन्दर

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  4. क्या बात है एकदम गज़ब कर दिए. बहुत ही सुन्दर बहुत ही सुन्दर

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