कहानी --- कतरा-कतरा ज़िन्दगी --- भाग दो

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कतरा-कतरा ज़िन्दगी
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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‘‘का हुआ बेटा?’’ हरिया ने प्रश्न उछाला। उसके पुत्र ने बिना कुछ कहे खेत के किनारे खड़े ट्रेक्टरों और खेत में हो रही खुदाई की तरफ इशारा किया।

‘‘ऐ ऽ ऽ ऽ ऐ.... का हो रओ जे सब? का कर रऐ हो तुम लोग?’’ चिल्लाते हुए हरिया उसी दिशा में दौड़ पड़ा। उसके पीछे-पीछे राघव भी दौड़ पड़ा।

‘‘ऐ....जे का कर रऐ?......... काऐ खुदाई कर रऐ?............. किनसे पूँछ के कर रऐ? हाँफते-हाँफते हरिया ने सवाल पर सवाल दाग दिये। खेत में खुदाई करने वालों की हरकत में किसी प्रकार का बदलाव नहीं हुआ। वे निर्विकार भाव से खेत में खुदाई का काम करते रहे।

हरिया के पुत्र ने खुदाई कर रहे एक आदमी को झकझोर दिया।

‘‘ओए....जो कछु कहने है हमसे कहियो, उनै अपनो काम करन देओ....समझे कि नहीं।’’ धुंधलके में कहीं दूर से एक ऐंठ भरी आवाज उभरी। हरिया और उसके पुत्र ने गरदन झटक कर आवाज की दिशा में देखा।

ट्रैक्टर के किनारे एक मोटर-साइकिल पर दो आकृतियाँ नजर आईं। आकृतियों को पहचानने में बमुश्किलएक पल लगा होगा कि ‘‘का बात है, दिख नई रओ का? नजदीकई आने पड़है का?’’ आवाज ने और एक आकृति की हरकत ने सारा संशय दूर कर दिया। इससे पहले कि हरिया ओर उसका पुत्र कुछ भी कहता, दोनो आकृतियाँ रोबीले अंदाज में टहलते हुए उनके पास आकर खड़ी हो गईं। उन दोनों आकृतियों की आँखों और शारीरिक भाव हरिया और उसके पुत्र की तरफ प्रश्नात्मक और उपेक्षापूर्ण थे।

‘‘जे का करवा रये हो?’’ हरिया ने हाथ जोड़कर उन दो में से एक से जो गाँव के मुखिया का पुत्र अवध था पूछा।

‘‘कछु नईं, बस ईंट भट्टा के लाने मिट्टी की जरूरत है सो बई खुदवा रये......... दिखत नईंया का?’’ अवध ने बड़ी उपेक्षा से जवाब देते हुए मजदूरों को हड़काया- ‘‘तुम सब खुदाई करो रे, मुफत को पैसा नईं दओ जा रओ....... जल्दी करो।’’

हरिया और उसके पुत्र को समझ नहीं आ रहा था कि मुखिया के ईंट भट्टे के लिए उसके खेतों की मिट्टी क्यों खोदी जा रही है। एक तो पिछले सालों के सूखे ने मिट्टी को खेत को वैसे भी बर्बाद कर दिया है, उस पर यह खुदाई तो रहे-सहे खेत को भी बर्बाद कर देगी।

‘‘जे न करो मालिक, नईं तो हमाये खेत बेकार हो जैं हैं। हम सब तो पहलेई से मर रये हैं.... अब तो साँचऊ जिन्दा न बचहैं।’’ हरिया के स्वर में गिड़गिड़ाहट थी।

‘‘हमें कछु न सुनाओ.... बाबू से बात करियो जा के। समझे। हमें खुदाई करके मिट्टी चाहिये सो निकाल रये हैं। अब भागो इधर से।’’

हरिया लाचार सा इधर-उधर देखने लगा। समझ नहीं आया कि क्या करे, क्या न करे। उसने देखा उससे लगे एक और खेत के किनारे से मिट्टी खोदी जा रही थी।

हरिया के पुत्र से अपने पिता की लाचारी, बेबसी न देखी गई। उसने थोड़ा तेज स्वर में कहा ‘‘तुम कौन से अधिकार से हमाये खेत की मिट्टी खुदवाये रये हो?’’

जवाब में दूसरी आकृति का एक झन्नाटेदार झापड़ उसके मँह पर पड़ा- ‘‘चुप बे हरामखोर, साले अधिकार की बात करत हो। अपने बाप से पूछो कि मुखिया से कर्जा का अपने बाप से पूछ के लओ तो?’’

भूख की मार, झापड़ की चोट, अपमान की तिलमिलाहट को हरिया और उसके पुत्र ने एक साथ महसूस किया। मजदूर इस घटनाक्रम से अनभिज्ञता सी बनाये हुए अपने काम में लगे रहे।

अवध और उसके साथी की गुण्डागर्दी से पूरा गाँव वाकिफ था। हरिया और उसका पुत्र चुपचाप अपने खेत की मिट्टी खुदते और ट्रैक्टर ट्रॉली को भरते देखते रहे। कुछ देर में काम पूरा हो जाने के बाद दोनो ट्रैक्टर और मोटर-साइकिल धूल का गुबार उड़ाते चले गये। हरिया उसी धूल के गुबार में एकदम ढहकर खेत की मिट्टी में मिल गया। अंधेरे में भी उसका पुत्र अपने पिता के चेहरे की परेशानी, निराशा को आसानी से पढ़ रहा था। उसने आगे बढ़कर अपने पिता को संभाला और दोनों भारी कदमों से मुखिया के घर की ओर चल दिये।

रामदेई अकुलाहट से अंदर बाहर हो रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आज राघव और हरिया को देर क्यों हो गयी है? वे दोनों रह कहाँ गये हैं? उसने चम्पा से समय पूछा। ‘आठ बज चुके हैं’ सुन कर रामदेई के प्राण सांसत में आ गये। ‘अभे तक तो आ जान चहिए हतो.....रोज तो आ जात हते........आज का हो गयो?’ रामदेई सोच-सोच कर परेशान होने लगी।

दरअसल गाँव के कुछ लोगों से उसे भी खेत की मिट्टी के खुदने की सूचना मिली थी। उसने खुद खेत पर जाकर मुखिया के बेटे अवध को खुदाई करने से रोका था।

‘‘काकी, तुमाये दिना नईंयां इतै-उतै टहलवे के, तुम चुपचाप घरै बैठो और हमें अपनो काम करन देओ।’’
‘‘नईं अवध, ऐसो न कहो........हम सब जा खेत की मट्टी खुदै से मर जैहें....काए गरीबन को सताउत हो?’’ रामदेई ने अवध को समझाते हुए गुहार लगायी।

‘‘को कह रओ कि तुम गरीब हो?....तुमाये पास तो बा सम्पत्त है जासे बड़े-बड़े काम निपट जात हैं, जा खुदाई कौन बला है।’’ कह कर अवध ने कुटिल मुस्कान बिखेरी।

रामदेई भी कोई नादान नहीं थी, अवध के कहे का तुरन्त मतलब समझ सन्न रह गयी। अवध की महिलाओं को छेड़ने की घटनायें तो वह सुनती रहती थी किन्तु उसे यह आभास बिलकुल भी नहीं था कि अवध्ा उसकी उम्र का लिहाज किये बिना उससे भी यह सब कह देगा। और भी उल्टी-सीधी बातों को सुनकर रामदेई खेतों से बापस आ गयी।

इधर अवध द्वारा किये गये व्यवहार और उधर हरिया, राघव के न आने से रामदेई कुछ ज्यादा ही परेशान हो उठी। जब समय खराब चल रहा होता है तो मन में विचार भी बुरे-बुरे आते हैं। एक पल को रामदेई ने सोचा कि शायद आज शहर में कोई बड़ा काम मिल गया होगा, इस कारण से आने में देर हो रही है। पर आये दिन सुनती दिल दहलाने वाली खबरों ने उसको घेरना शुरू कर दिया। कहीं कुछ कर न लिया हो.......... कहीं कोई दुर्घटना न हो गयी हो............ ऐसा तो नहीं कि खेत पहुँचने पर अवध से लड़ाई न हो गयी हो....आदि-आदि। ऐसे विचार आते ही रामदेई सिर को झटकती और अपना मन किसी न किसी काम में लगाने का करती।

तभी दरवाजे पर आहट पाकर वह दरवाजे पर लपकी। ‘‘किते रह गये थे दोऊ जनै? इत्ती देर किते लगा दई हती?’’ घर में घुसने से पहले ही हरिया को रामदेई के सवालों का सामना करना पड़ा। परेशानी से हताश, निराश होकर आये दिन किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं की खबरों ने सभी परिवारों को संशय और भयग्रस्त बना दिया। घर के किसी भी सदस्य के थोड़ा-बहुत देर से आने पर मन में बुरे ख्यालात आने लगते हैं।

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तीसरा भाग कल शाम 07:00 बजे

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