गुरुवार, 14 जनवरी 2010

जोर से बोलो जिन्दाबाद

जोर-शोर से नारेबाजी हो रही थी। महाशय ‘अ’ चुनाव जीतने के बाद वह मंत्री बनने के बाद अपने शहर में पहली बार आ रहे थे। उनके परिचित तो परिचित, अपरिचित भी उनके अपने होने का एहसास दिलाने के लिए उनकी अगवानी में खड़े थे।

शहर की सीमा-रेखा को निर्धारित करती नदी के पुल पर भीड़ पूरे जोशोखरोश से अपने नवनिर्वाचित मंत्री को देखने के लिए आतुर थी। उस सम्बन्धित दल के एक प्रमुख नेता माननीय ‘ब’ भी मुँह लटकाये, मजबूरी में उस मंत्री के स्वागत हेतु खड़े दिखाई पड़ रहे थे।

मजबूरी यह कि पार्टी में प्रमुख पद पर होने के कारण पार्टी आलाकमान के आदेश का पालन करना है साथ ही ऊपर तक अपने कर्तव्यनिष्ठ होने का संदेश भी देना है। नाराज इस कारण से हैं कि नवनिर्वाचित मंत्री ने अपने धन-बल से उन महाशय का टिकट कटवा कर स्वयं हासिल कर लिया था।

सभी को उस पार्टी के बँधे-बँधाये वोट बैंक का सहारा हमेशा रहता रहा है। इसी कारण माननीय ‘ब’ को इस बार टिकट मिलने और जीतने का पूरा भरोसा था। उनके इस भरोसे को महाशय ‘अ’ ने पूरी तरह से ध्वस्त कर धन-बल की ताकत से स्वयं का टिकट और जीत पक्की कर ली।

तभी भीड़ के चिल्लाने और रेलमपेल मचाने से नवनिर्वाचित मंत्री के आने का संदेश मिला। माननीय ‘ब’ ने स्वयं को संयमित करके माला सँभाली और महाशय ‘अ’ की ओर सधे कदमों से बढ़े। भीड़ में अधिसंख्यक लोग धन-सम्पन्न महाशय के समर्थक थे, उनका पार्टी के समर्थकों, कार्यकर्ताओं, वोट बैंक से बस जीतने तक का वास्ता था। पार्टी के असल कार्यकर्ता हाशिये पर थे और बस नारे लगाने का काम कर रहे थे।

माननीय ‘ब’ हाथ में माला लेकर आगे बढ़े किन्तु हो रही धक्कामुक्की के शिकार होकर गिर पड़े। मंत्री जी की कार उनकी माला को रौंदती हुई आगे बढ़ गई। अनजाने में ही सही किन्तु एक बार फिर महाशय ‘अ’ के द्वारा पछाड़े जाने के बाद माननीय ‘ब’ खिसिया कर रह गये।

अपनी खिसियाहट, खीझ और गुस्से को काबू में करके माननीय ‘ब’ अपनी पार्टी के असली समर्थकों के साथ नारे लगाने में जुट गये। अब वे जान गये थे कि वर्ग विशेष का भला करने निकला उनका दल अब धन-कुबेरों के बनाये दलदल में फँस गया है, जहाँ बाहुबलियों और धनबलियों का ही महत्व है। उन जैसे समर्थित और संकल्पित कार्यकर्ता अब सिर्फ नारे लगाने और पोस्टर चिपकाने के लिए ही रह गये हैं।

7 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

अच्छी लघु कथा।

राजीव तनेजा ने कहा…

बहुत ही बढ़िया व्यंगात्मक लघुकथा ...

Udan Tashtari ने कहा…

ये कहानी क्या कहीं और भी छापी थी आपने?? मुझे अच्छी तरह याद है कि मैने इस कहानी पर टिप्पणी की थी कुछ ऐसी कि अ और ब के चक्कर में.......टाईप!!

दीपक 'मशाल' ने कहा…

yahi ho raha hai ab desh me... na loktantra loktantra hai aur na raajneeti raajneeti. sajeev kar diya aapne drishya ko apni kalam se chacha ji...
Jai Hind...

निर्मला कपिला ने कहा…

बिलकुल सही कहा लघुकथा के माध्यम से आज की राज्नीति का चेहरा नंगा किया है धन्यवाद्

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

एक सच को प्रभावी ढंग से सामने लाती लघुकथा...बेहतरीन है.
______
शब्द-शिखर पर इस बार काला-पानी कहे जाने वाले "सेलुलर जेल" की यात्रा करें और अपने भावों से परिचित भी कराएँ.

डा.सुभाष राय ने कहा…

कुमार जी, अच्छी रचना. समय के सत्य को उद्घाटित करती हुई पर जो माननीय टिकट न मिलने से परेशान हैं, उनके साथ भी वैसे ही लोग होंगे क्योंकि आजकल तो टिकट पक्का कराने के लिये भी धन चाहिये। माननीय अ और ब की पह्चान की जगह कोई नाम कर दें तो शायद खट्कन खत्म हो जाय।
www.sakhikabira.blogspot.com