शनिवार, 19 सितंबर 2009

प्रेम का स्वरुप


तब - लड़का लड़की बाजार में पहजी बार मिले। एक झलक में लड़का लड़की का दीवाना हो गया। उसने आकर लड़की से कुछ पूछा। चुलबुली लड़की ने शोख अंदाज में हँसी-ठिठोली में हर सवाल का जवाब दिया। लड़की की कलात्मक चुनरी के बारे में पूछने पर लड़के को पता लगा कि लड़की की सगाई हो गई है। लड़की का प्यार, उसकी मोहक छवि, हँसी-ठिठोली, पहली मुलाकात लड़के के दिल में सदा बसी रही। और एक दिन लड़के ने मौत को हरा कर प्यार को अमर कर दिया क्योंकि ‘‘उसने कहा था।’’

अब - लड़के ने लड़की को देखा और प्यार हो गया। इंटरनेट पर चैटिंग, फोन पर बात और मोबाइल पर एस0एम0एस0 की बरसात हुई। लड़की ने लड़के को अपनी शादी के बारे में बताया। लड़का प्यार को देह, आकर्षण को हवस और समर्पण को कमजोरी से तौलने लगा। और एक दिन लड़के ने विश्वास को दरकिनार कर प्रेम को मौत दे दी; लड़की के चेहरे पर तेजाब फेंक दिया क्योंकि ‘‘उसने ‘नहीं’ कहा था।’’

समय के साथ प्रेम का स्वरूप भी बदल रहा है।

6 टिप्‍पणियां:

सुशीला पुरी ने कहा…

आप सही कह रहे हैं .....समय के साथ स्वरुप तो बदला है ,पर उपयोगिता तो अभी भी उतनी ही है और स्वरुप भले बदल जाए पर
विकल्प नही है प्रेम का..........आज भी .

hem pandey ने कहा…

थोड़े शब्दों में बड़ी बात कह दी.साधुवाद.

महफूज़ अली ने कहा…

aapko deepawali ki haardik shubhkaamnayen......

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

वाह...वाह......वाह..... "उसने कहा था" कहानी का दूसरा रूप दिखा दिया आपने ......लाजवाब ....!!

वाणी गीत ने कहा…

समय के साथ सबकुछ बदल गया है ...प्रेम भी ...
वास्तव में प्रेम नहीं बदला ... प्रेम की परिभाषाएं और उसे जीने वाले बदल गए हैं ...!

abhay ने कहा…

क्योंकि ‘‘उसने ‘नहीं’ कहा था।’’
ultimate mama :)
ye kahani hamaare course mein thi..bahut saalon baad yaad aa gayi..around 12 saal baad :))