भूख और बेबसी

उसने चूल्हे में कुछ सूखी लकड़ियाँ डालकर उनमें आग लगा दी और चूल्हे पर बर्तन चढ़ाकर उसमें पानी डाल दिया। बच्चे अभी भी भूख से रो रहे थे। छोटी को उसने उठाकर अपनी सूखी पड़ी छाती से चिपका लिया। बच्ची सूख चुके स्तनों से दूध निकालने का जतन करने लगी और उससे थोड़ा बड़ा लड़का अभी भी रोने में लगा था।
उस महिला ने खाली बर्तन में चिमचा चलाना शुरू कर दिया। बर्तन में पानी के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था पर बच्चों को आस थी कि कुछ न कुछ पक रहा है। आस के बँधते ही रोना धीमा होने लगा किन्तु भूख उन्हें सोने नहीं दे रही थी।
वह महिला जो माँ भी थी बच्चों की भूख नहीं देख पा रही थी, अन्दर ही अन्दर रोती जा रही थी। बच्चे भी कुछ खाने का इंतजार करते-करते झपकने लगे। उनके मन में थोड़ी देर से ही सही कुछ मिलने की आस अभी भी थी।
बच्चों के सोने में खलल न पड़े इस कारण माँ खाली बर्तन में पानी चलाते हुए बर्तनों का शोर करती रही और बच्चे भी हमेशा की तरह एक धोखा खाकर आज की रात भी सो गये।

प्रेम का स्वरुप


तब - लड़का लड़की बाजार में पहजी बार मिले। एक झलक में लड़का लड़की का दीवाना हो गया। उसने आकर लड़की से कुछ पूछा। चुलबुली लड़की ने शोख अंदाज में हँसी-ठिठोली में हर सवाल का जवाब दिया। लड़की की कलात्मक चुनरी के बारे में पूछने पर लड़के को पता लगा कि लड़की की सगाई हो गई है। लड़की का प्यार, उसकी मोहक छवि, हँसी-ठिठोली, पहली मुलाकात लड़के के दिल में सदा बसी रही। और एक दिन लड़के ने मौत को हरा कर प्यार को अमर कर दिया क्योंकि ‘‘उसने कहा था।’’

अब - लड़के ने लड़की को देखा और प्यार हो गया। इंटरनेट पर चैटिंग, फोन पर बात और मोबाइल पर एस0एम0एस0 की बरसात हुई। लड़की ने लड़के को अपनी शादी के बारे में बताया। लड़का प्यार को देह, आकर्षण को हवस और समर्पण को कमजोरी से तौलने लगा। और एक दिन लड़के ने विश्वास को दरकिनार कर प्रेम को मौत दे दी; लड़की के चेहरे पर तेजाब फेंक दिया क्योंकि ‘‘उसने ‘नहीं’ कहा था।’’

समय के साथ प्रेम का स्वरूप भी बदल रहा है।

आज का युवा

शाम होते ही होने लगते हैं जमा,
कुछ युवा
सड़क के किनारे बनी
चाय व पान की दुकान पर
क्योंकि वे सड़क के दूसरे छोर पर
बने मकानों के
सुंदर मुखड़ों के दर्शनार्थ
यहाँ आते हैं,
और इस प्रकार
अपनी अतृप्त आशाओं, इच्छाओं को
अपनी आँखों के सहारे मिटाते हैं।
एक नियम की भाँति हर शाम
यहाँ जमा होने का क्रम।
अपने अधगले विचारों का प्रदर्शन,
इसके साथ ही
उड़ने लगते हैं धुँए के गुबार,
लगने लगते हैं कहकशे
बिना बात बार-बार।
उन्हें नहीं मालूम होता है
इतिहास अपने देश का,
भविष्य अपने वर्तमान का,
पर...............
वे जानते हैं, रखते हैं
सामने वालों के
एक-एक पल का हिसाब।
सुबह उठने तलक से सोने तक का हिसाब,
कालेज आने जाने से लेकर
बाजार हाट तक का समाचार।
कभी सामने देख कर बस एक ही झलक,
संवारने लगते हैं
अपने बाल,
गले में बँधे रूमाल,
और रंग-बिरंगी पोशाकों के पीछे से
जाहिर करते हैं
अपने होने की बात।
रहती है कोशिश उनकी
अपने बेढंगे हावभाव के द्वारा
सामने दिखते कुछ विपरीत ध्रुवों को
आकर्षित करने की।
अपनी इस विकृत छवि के सहारे,
उनसे मेलजोल बढ़ाने की।
पर इस क्रियाकलाप में
यह भूल जाते हैं कि
कहीं दूर सड़क के किनारे
बना है......
उनका भी घर.......
उन्हीं की तरह के कुछ रंगीन युवा
लगा रहे होंगे
उसका चक्कर।

सामाजिक सन्दर्भों में नई कविता

सामाजिक संदर्भों में नई कविता
डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

साहित्य की उपयोगिता सामाजिक संदर्भों में क्या हो; कैसी हो, पर हमेशा विमर्श होता रहा है। पूर्वी और पश्चिमी साहित्यिक चिन्तक इस पर अपनी अलग-अलग राय देते दिखाई देते हैं। इस बात पर जोर प्रमुखता से दिया जाता रहा है कि साहित्य किसी न किसी रूप में मानव हित में, समाज हित में कार्य करता है। चूँकि साहित्य की प्राचीन एवं लोकप्रिय विधा के रूप में ‘पद्य’ हमेशा से समाज में स्वीकार्य रहा है। पद्य के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन तक का कार्य कवियों ने कर दिखाया है। सामाजिक संदर्भों में देखें तो सीमा पर, रणक्षेत्र में लड़ते वीर जवानों को, खेतों में काम करते किसानों, मजदूरों को, सोई जनता, बेखबा सत्ता को झकझोरने को कवियों ने हमेशा कविता को हथियार बनाया है। देखा जाये तो श्रम और वाणी का सम्बन्ध सदा से ही घनिष्टता का रहा है। भले ही कई सारे श्रमिक कार्य करते समय निरर्थक शब्दों को उच्चारित करते हों पर उन सभी का मिला-जुला भाव ‘काव्य रूप’ सा होता है।
साहित्य सार्थक शब्दों की ललित कला है। अनेक विधाओं में मूल रूप में कहानी-कविता को समाज ने आसानी से स्वीकारा है। दोनों विधाओं में समाज की स्थिति को भली-भांति दर्शाने की क्षमता है। पूर्व में कविता जब भावों, छन्दों, पदों की सीमा में निबद्ध थी तब प्रत्येक व्यक्ति के लिए काव्य रूप में अपने मनोभावों को व्यक्त करना सम्भव नहीं हो पाता था। नयी कविता के पूर्व प्रगतिशील, प्रयोगवादी, समकालीन कविता आदि के नाम से रची-बसी कविता ने मनोभावों को स्वच्छन्दता की उड़ान दी। नायक-नायिकाओं की चेष्टाओं, कमनीय काया का कामुक चित्रण, राजा-बादशाहों का महिमामण्डन करती कविता से इतर नयी कविता ने समाज के कमजोर, दबे-कुचले वर्ग की मानसिकता, स्थिति को उभारा है।
साहित्य जगत में नयी कविता का प्रादुर्भाव एकाएक ही नहीं हुआ। रूमानी, भक्ति, ओज की कविताओं के मध्य देश की जनता सामाजिक समस्याओं से भी दोचार हो रही थी। स्वतन्त्रता आन्दोलन का चरम, स्वतन्त्रता प्राप्ति, द्वितीय महायुद्ध, भारतीय परिवेश के स्थापित होने की प्रक्रिया, राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता की सरगरमियाँ आदि ऐसी घटनायें रहीं जिनसे कविता भी प्रभावित हुए बिना न रह सकी। नागार्जुन, केदार नाथ, नरेश मेहता, मुक्तिबोध, दुष्यन्त कुमार सहित अनेक कवि काव्य-रचनाओं के माध्यम से आम आदमी की समस्या को उठा रहे थे तो कविता का भी नया दौर ला रहे थे। इन कवियों ने समाज के प्रत्येक वर्ग की पीढ़ा को सामने रखा। नयी कविता पर अतुकान्त, छन्दहीनता का आरोप लगता रहा किन्तु वह अपनी आम जन की बोलचाल की भाषा को अपना कर पाठकों के मध्य लोकप्रियता प्राप्त करती रही।
स्वतन्त्रता के बाद की स्थिति की करुणता को आसानी से नयी कविता में देखा गया। किसान हों, श्रमिक हों या किसी भी वर्ग के लोग हों सभी को नयी कविता में आसानी से दिखाया गया है। इन सभी का एक मूर्त बिम्ब निराला की ‘तोड़ती पत्थर’ कविता में आसानी से देखा जा सकता है। यद्यपि निराला को नयी कविता का कवि नहीं स्वीकार किया गया है उनकी बाद की काव्य-रचनाओं को किसी भी रूप में नयी कविता से अलग नहीं किया जा सकता है-
‘देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर
नहीं छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी
वह स्वीकार
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन, प्रिय कर्म-रत मन
गुरु हथौड़ा हाथ
करती बार-बार प्रहार
x x x
गई चिनगी छा गई, प्रायः हुई दुपहर-
वह तोड़ती पत्थर।’ -निराला, वह तोड़ती पत्थर
नयी कविता की प्रमुख बात यह रही कि इसमें कवियों ने दबे कुचले शोषित वर्ग को ही अपना आधार बनाया है। नारी रूप में उसकी कोमल देह, कंचन कपोल, ढलकती आँखें, काले केश ही नहीं दिखे बल्कि उसकी मनोदशा, उसकी स्थिति को भी दर्शाया है। वेश्या जीवन हो या किसी एक्सट्रा की स्थिति कवियों ने उसे भी स्वर दिया है-
‘सिन्दूर पर हजारों के नाम
होंठ पर अठन्नी की चमक
गर्भ में अज्ञात पिता का अंश
फेफड़ों में टी0वी0 की गमक
- एक रुपया
- नहीं दो रुपया
कौन?
सीता?
सावित्री?’ -मृत्युंजय उपाध्याय, कौन, किन्तु
इसी तरह
‘मैं एक्सट्रा हूँ
एक्सट्रा यानि कि फालतू
गिनती से ज्यादा
फिलहाल बेकार
बेजरूरत।’ - विजयचन्द, एक्सट्रा
नयी कविता के माध्यम से समाज की समस्या को आसानी से उभारा गया है। वर्ग-संघर्ष को, पूँजीवादिता को, इन सबके द्वारा जनित समस्याओं और अन्तर्विरोधों को नयी कविता में दर्शाया गया है। इन विषमताओं के कारण आम आदमी किस कदर हताश, परेशान है इसे नयी कविता ने अपना विषय बनाया है-
‘काठ के पैर
ठूँठ सा तन
गाँठ सा कठिन गोल चेहरा
लम्बी उदास, लकड़ी-डाल से हाथ क्षीण
वह हाथ फैल लम्बायमान
दूरस्थ हथेली पर अजीब
घोंसला
पेड़ में एक मानवी रूप
मानवी रूप में एक ठूँठ।’ - मुक्तिबोध, इस चैड़े ऊँचे टीले पर
नयी कविता ने मध्यमवर्गीय मनःस्थिति को उठाया है। गहरी निराशा, अवसाद और अपनी विसंगति को आक्रोशपूर्ण स्वर दिया है। मानव-मन के साथ-साथ वह देश की व्यवस्था को भी समग्र रूप से संदर्भित करती है-
‘मेरा देश-
जहाँ बचपन भीख माँगते जवान होता है
और जवानी गुलामी करते-करते बुढ़िया हो जाती है
जहाँ अन्याय को ही नहीं
न्याय को भी अपनी स्थापना के लिए सिफारिशों की जरूरत होती है
और झूठ ही नहीं
सच भी रोटरी मशीनों और लाउडस्पीकरों का मुहताज है।’
सामाजिक संदर्भों में नयी कविता ने हमेशा विषमता, अवसाद, निराशा को ही नहीं उकेरा है। सामाजिक यथार्थ के इस सत्य पर कि कल को हमारी नासमझी हमारे स्वरूप को नष्ट कर देगी, कुछ समाज सुधार की बात भी कही है। प्रकृति की बात कही है, प्रेम की बात कही है, सबको साथ लेकर चलने की बात की है। नयी कविता ने देश-प्रेम, मानव प्रेम, प्रकृति प्रेम को विविध रूपों में उकेरा है-
‘कोई हँसती गाती राहों में अंगार बिछाये ना-
पथ की धूल है ये, इससे प्यार मुझको
कोई मेरी खुशहाली पर खूनी आँख उठाये ना-
मेरा देश है ये, इससे प्यार मुझको!’ - वीरेन्द्र मिश्र, मेरा देश
मानव प्रेम के, प्रणय के कुछ दृश्य इस प्रकार से हैं-
‘याद तो होगा तुम्हें वह मधु-मिलन क्षण
जब हृदय ने स्वप्न को साकार देखा।’
‘तुम्हारी रेशमीन जुल्फों को सहलाती
मेरे प्यार की लालायित अँगुलियों पर
शोषण के भयंकर भुजंगम दम तोड़ रहे हैं।’
- वीरेन्द्र कुमार जैन, अनायता की आँखें
‘और जब मैं तुम्हें अपनी गोद में लिटाये हुए
तुम्हारे केशों में अपनी अँगुलियाँ फिरा रहा होता हूँ
मेरे विचार हाथों में बंदूकें लिए
वियतनाम के बीहड़ जंगलों में घूम रहे होते हैं।’
‘झाड़ी के एक खिले फूल ने
नीली पंखुरियों के एक खिले फूल ने
आज मुझे काट लिया
ओठ से
और मैं अचेत रहा
धूप में!’ - केदार, फूल नहीं रंग बोलते हैं
कहना होगा कि नयी कविता ने समाज के बीच से निकल कर स्वयं को समाज के बीच स्थापित किया है। समाज में आसानी से प्रचलन में आने वाले हिन्दी, अंग्रेजी, देशज, उर्दू शब्दों को अपने में सहेज कर नयी कविता ने समाज की भाषा-बोली को जीवन दिया है। इसके लिए उसने नये-नये प्रतिमानों को भी गढ़ा है-
‘सीली हुई दियासलाई की तरह असहाय लोग’ - नरेश मेहता
‘नीबू का नमकीन रूप शरबत शाम’ - शमशेर
कैमरे के लैंस सी आँखें बुझी हुईं’ - भारतभूषण अग्रवाल
इस तरह के एक दो नहीं वरन् अनेक उदाहरण ‘नयी कविता’ में दृष्टव्य हैं। इससे लगता है कि नयी कविता ने ‘लीक’ तोड़ कर समाज के प्रचलित अंगों को अपने साथ समेटा है। नयी कविता ने कविता की सीमाबन्दी को तोड़कर कुछ नया करने का ही प्रयास किया है। आम आदमी के दंश, मानसिक संवेदना को समाज में स्थापित करने से आभास हुआ है कि नयी कविता इसी समाज की कविता है। जहाँ यदि राजा की यशोगाथा गाई जाती है वहीं वेश्या की मानसिकता भी समझी जाती है; जहाँ किसी यौवन के अंगों पर कविता होती है तो मजदूरन भी उसी का हिस्सा बनती है; साहित्यिकता के मध्य देशज शब्दों को, बोलचाल की आम भाषा-शैली को भी स्थान प्राप्त होता है। इस दृष्टि से नयी कविता समाज से अलग न होकर समाज से जुड़ी प्रतीत होती है। यूँ तो प्रत्येक कालखण्ड में आती कविता को नया ही कहा जायेगा किन्तु सहज, सर्वमान्य नयी कविता के इस रूप ने जिन प्रतिमानों, उपमानों की स्थापना की है उन्होंने सही अर्था में समाज की सशक्त इकाई -मानव- और मानव-मूल्यों को महत्व दिया है। नयी कविता निःसन्देह सामाजिक संदर्भों में खरी प्रतीत होती है।

यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया

‘यौन शिक्षा’, यदि इसके आगे कुछ भी न कहा जाये तो भी लगता है कि किसी प्रकार का विस्फोट होने वाला है। हमारे समाज में ‘सेक्स’ अथवा ‘यौन’ को एक ऐसे विषय के रूप में सहज स्वीकार्यता प्राप्त है जो पर्दे के पीछे छिपाकर रखने वाला है; कहीं सागर की गहराई में दबाकर रखने वाला विषय है। यह भारतीय समाज के संस्कारित परिवेश का परिणाम है अथवा ‘सेक्स’ को सीमित परिधि में परिभाषित करने का परिणाम है कि समाज में ‘सेक्स’ सभी के जीवन में भीतर तक घुला होने के बाद भी ‘आतंक’ का पर्याय है। यह बात सत्य हो सकती है कि भारतीय, सामाजिक, पारिवारिक परम्पराओं के चलते ‘सेक्स’ ऐसा विषय नहीं रहा है जिस पर खुली बहस अथवा खुली चर्चा की जाती रही हो। ‘सेक्स’ को मूलतः दो विपरीत लिंगी प्राणियों के मध्य होने वाले शारीरिक संसर्ग को समझा गया है (चाहे वे प्राणी मनुष्य हों अथवा पशु-पक्षी) और इस संकुचित परिभाषा ने ‘सेक्स एजूकेशन’ अथवा ‘यौन शिक्षा’ को भी संकुचित दायरे में ला खड़ा कर दिया है।
‘यौन शिक्षा’ अथवा ‘सेक्स एजूकेशन’ के पूर्व ‘सेक्स’ को समझना आवश्यक होगा। ‘सेक्स’ का तात्पर्य आम बोलचाल की भाषा में ‘लिंग’ अथवा शारीरिक संसर्ग से लगाते हैं। ‘सेक्स’ अथवा ‘सेक्स एजूकेशन’ का अर्थ मुख्यतः मनुष्य, पशु-पक्षी (विशेष रूप से स्त्री-पुरुष) के मध्य होने वाली शारीरिक क्रियाओं से लगा कर इसे चुनौतीपूर्ण बना दिया है। एक पल को ‘सेक्स एजूकेशन’ के ऊपर से अपना ध्यान हटाकर मानव जीवन की शुरुआत से उसके अंत तक दृष्टिपात करें तो पता लगेगा कि ‘सेक्स एजूकेशन’ का प्रारम्भ तो उसके जन्म लेने के साथ ही हो जाता है। इसे उम्र के कुछ प्रमुख पड़ावों के साथ आसानी से समझा जा सकता है-
एक-दो वर्ष से लेकर चार-पाँच वर्ष तक की उम्र तक के बच्चे में अपने शरीर, लैंगिक अंगों के प्रति एक जिज्ञासा सी दिखाई देती है। इस अबोध उम्र में बच्चे अपने यौनिक अंगों को छूने, उनके प्रदर्शन करने, एक दूसरे के अंगों के प्रति जिज्ञासू भाव रखने जैसी क्रियाएँ करते हैं। यही वह उम्र होती है जब बच्चों (लड़के, लड़कियों में आपस में) में जिज्ञासा होती है कि वे इस धरती पर कैसे आये? कहाँ से आये? या फिर कोई उनसे छोटा बेबी कहाँ से, कैसे आता है? इस जिज्ञासा की कड़ी में आपने इस उम्र के बच्चों को ‘पापा-मम्मी’, ‘डाक्टर’ का खेल खेलते देखा होगा। परिवारों के लिए यह हास्य एवं सुखद अनुभूति के क्षण होते हैं पर बच्चे इसी खेल-खेल में एक दूसरे के यौनिक अंगों को छूने की, उन्हें देखने की, परीक्षण करने की चेष्टा करते हैं (वे आपस में सहजता से ऐसा करने भी देते हैं) पर इसके पीछे किसी प्रकार की ‘सेक्सुअलिटी’, शारीरिक सम्बन्धों वाली बात न होकर सामान्य रूप से अपनी शारीरिक भिन्नता को जानने-समझने का अबोध प्रयास मात्र होता है। इस उम्र में एक प्रकार की लैंगिक विभिन्नता उन्हें आपस में दिखायी देती है; लड़के-लड़कियों को अपने यौनिक अंगों में असमानता; मूत्र त्याग करने की प्रक्रिया में अन्तर; शारीरिक संरचना में विभिन्नता दिखती है जो निश्चय ही उनके ‘लैंगिक बोध’ को जाग्रत करतीं हैं। देखा जाये तो यह उन बच्चों की दृष्टि में यह ‘सेक्सुअल’ नहीं है, शारीरिक संपर्क की परिभाषा में आने वाला ‘सेक्स’ नहीं है।
पाँच वर्ष से दस वर्ष तक की उम्र के बच्चों में अपने लड़के एवं अपने लड़की होने का एहसास उस अवस्था में आ जाता है जहाँ उनकी लैंगिक जिज्ञासा तीव्रता पकड़ती है पर वे एक दूसरे से अपने यौनिक अंगों के प्रदर्शन को छिपाते हैं। लड़के-लड़कियों में एक-दूसरे के प्रति मेलजोल का झिझक भरा भाव होता है। इस समयावधि में ‘सेक्स’ से सम्बन्धित जानकारी, शारीरिक परिवर्तनों से सम्बन्धित जानकारी के लिए वे समलिंगी मित्र-मण्डली की मदद लेते हैं। इस आधी-अधूरी जानकारी को जो टी0वी0, इण्टरनेट, पत्र-पत्रिकाओं आदि से प्राप्त होती है, के द्वारा वे ‘सेक्स’ से सम्बन्धित शब्दावली, यौनिक अंगों से सम्बन्धित शब्दावली को आत्मसात करना प्रारम्भ कर देते हैं। यह जानकारी उन्हें भ्रमित को करती ही है, अश्लीलता की ओर भी ले जाती है। इस समयावधि में शारीरिक विकास भी तेजी से होता है जो इस उम्र के बच्चों में शारीरिक आकर्षण भी पैदा करता है। लड़का हो या लड़की, इस उम्र तक वह विविध स्त्रोतों से बहुत कुछ जानकारी (अधकचरी ही सही) प्राप्त कर चुके होते हैं और यही जानकारी उनको ‘सेक्स’ के प्रति जिज्ञासा पैदा करती है जिस ‘सेक्स’ को शारीरिक क्रिया से जोड़ा जाता रहा है। हालांकि परिवार में इस उम्र से पूर्व वे बच्चे अपने माता-पिता अथवा घर के किसी अन्य युगल को शारीरिक संसर्ग की मुद्रा में अचानक या चोरी छिपे देख चुके होते हैं जो उनकी जिज्ञासा को और तीव्र बनाकर उसके समाधान को प्रेरित करती है; लड़कियों में शारीरिक परिवर्तनों की तीव्रता लड़कों के शारीरिक परिवर्तनों से अधिक होने के कारण उनमें भी एक प्रकार की जिज्ञासा का भाव पैदा होता है। अभी तक के देखे-सुने किस्सों, जानकारियों के चलते विपरीत लिंगी बच्चों में आपस में शारीरिक आकर्षण देखने को मिलता है।
खेल-खेल में, हँसते-बोलते समय, पढ़ते-लिखते समय, उठते-बैठते समय, भोजन करते या अन्य सामान्य क्रियाओं में वे किसी न किसी रूप में अपने विपरीत लिंगी साथी को छूने का प्रयास करते हैं। इस शारीरिक स्पर्श के पीछे उनका विशेष भाव (जो भले ही उन्हें ज्ञात न हो) अपनी यौनिक जिज्ञासा को शान्त करना होता है और इसमें उनको उस समय तृप्ति अथवा आनन्दिक अनुभूति का एहसास होता है जब वे अपने विपरीत लिंगी साथी के अंग विशेष-गाल, सीना, कंधा, जाँघ आदि- का स्पर्श कर लेते हैं। इस यौनिक अनुभूति के आनन्द के लिए वे विशेषतः बात-बात पर एक दूसरे का हाथ पकड़ते, आपस में ताली मारते भी दिखायी देते हैं।
दस वर्ष के ऊपर की अवस्था में आने के बाद शारीरिक परिवर्तन, शारीरिक विकास के साथ-साथ यौनिक विकास, यौनिक परिवर्तन भी होने लगता है। यह परिवर्तन लड़को की अपेक्षा लड़कियों में तीव्रता से एवं स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। लड़कियों में मासिक धर्म की शुरूआत उनमें एक प्रकार की जिज्ञासा तथा एक प्रकार का भय पैदा करती है। यही वह स्थिति होती है जब भारतीय परिवारों में सम्भवतः पहली बार किसी लड़की को अपनी माँ, चाची, भाभी, बड़ी बहिन आदि से ‘सेक्स’ को लेकर किसी प्रकार की जानकारी मिलती है। इस ‘सेक्स एजूकेशन’ में जिज्ञासा की शान्ति, जानकारियों की प्राप्ति कम, भय, डर, सामाजिक लोक-लाज का भूत अधिक होता है। ऐसी ‘यौन शिक्षा’ लड़कियों में अपने यौनिक-शारीरिक विकास के प्रति भय ही जाग्रत करती है, उनकी किसी जिज्ञासा को शान्त नहीं करती है।
लड़कों में यह स्थिति और भी भयावह होती है; परिवार से किसी भी रूप से कोई जानकारी न दिए जाने के परिणामस्वरूप वे सभी अपने मित्रों, पुस्तकों, इंटरनेट आदि पर भटकते रहते हैं और थोड़ी सी सही जानकारी के साथ-साथ बहुत सी भ्रामक जानकारियों का पुलिंदा थामें भटकते रहते हैं। शारीरिक विकास, यौनिक अंगों में परिवर्तन, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण, सेक्स सम्बन्धी जानकारी, शारीरिक संसर्ग के प्रति जिज्ञासा अब जिज्ञासा न रह कर प्रश्नों, परेशानियों का जाल बन जाता है। इसमें उलझ कर वे शारीरिक सम्बन्धों, टीनएज़ प्रेगनेन्सी, गर्भपात, यौनजनित रोग, आत्महत्या जैसी स्थितियों का शिकार हो जाते हैं।
इन सारी स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो क्या लगता नहीं है कि जिस यौनिक उत्तेजना, यौनिक जिज्ञासा, लैंगिक विभिन्नता, शारीरिक विभिन्नता, शारीरिक-यौनिक विकास, शारीरिक सम्बन्ध, विपरीत लिंगी आकर्षण के प्रति जिज्ञासुभाव बचपन से ही रहा हो उसका समाध्न एक सर्वमान्य तरीके से हो, सकारात्मक तरीके से हो, न कि आधी-अधूरी, अध्कचरी, भ्रामक जानकारी के रूप में हो? यहाँ ‘सेक्स एजूकेशन’ की वकालत करने, उसको लागू करने अथवा देने के पूर्व एक तथ्य विशेष को मन-मश्तिष्क में हमेशा रखना होगा कि यह शिक्षा उम्र के विविध पड़ावों को ध्यान में रखकर अलग-अलग रूप से अलग-अलग तरीके से दी जानी चाहिए। ऐसा नहीं कि जिस ‘यौन शिक्षा’ के स्वरूप को हम छोटे बच्चों को दें वही स्वरूप टीनएजर्स के सामने रख दें।
यहाँ आकर यह तो स्पष्ट होता है कि ‘यौन शिक्षा’ क्यों और कैसी हो। बच्चों की दुनिया पर निगाह डालें तो हमें पता चलेगा कि ज्यादातर बच्चे-लड़के, लड़कियाँ दोनों ही- शारीरिक दुराचार का शिकार होते हैं। हम इसके कारणों का पता लगाये बिना इस अपराध को मिटाना तो दूर इसे कम भी नहीं कर सकते। बड़ी आयु के लोगों द्वारा बच्चों के शारीरिक शोषण की घटनाओं के साथ-साथ अब बच्चों द्वारा ही आपस में शारीरिक दुराचार की घटनायें भी सामने आने लगीं हैं। यहाँ हम बच्चों को ‘यौन शिक्षा’ के द्वारा स्त्री-पुरुष सम्बन्धों, मासिक धर्म, गर्भधारण, शारीरिक सम्बन्धों की जानकारी देकर उनका भला नहीं कर सकते। इस उम्र के बच्चों को ‘यौन शिक्षा’ के माध्यम से समझाना होगा कि एक लड़के और एक लड़की के शारीरिक अंग क्या हैं? उनमें अन्तर क्या है? हमें बताना होगा कि उनके शरीर में यौनिक अंगों की महत्ता क्या है? इन अंगों का इस उम्र विशेष में कार्य क्या है? इन बातों के अलावा इस उम्र में वर्तमान परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में ‘सेक्स एजूकेशन’ के रूप में बच्चों को समझाना होगा कि किसी भी लड़का-लड़की के शरीर के यौनिक अंग उसके व्यक्तिगत अंग होते हैं, जिनका प्रदर्शन नहीं किया जाना चाहिए। शरीर के इन अंगों को न किसी को स्पर्श करने देना चाहिए न किसी दूसरे के यौनिक अंगों को स्पर्श करना चाहिए। किसी के कहने पर भी उसके इन अंगों का स्पर्श नहीं करना चाहिए और न ही अपने इन अंगों का स्पर्श करवाना चाहिए यदि कोई ऐसा करता भी है (भले ही प्यार से या कुछ देकर या जबरदस्ती) तो तुरन्त अपने माता-पिता, शिक्षकों अथवा किसी बड़े को इसकी जानकारी देनी चाहिए।
हमारे पारिवारिक-सामाजिक ढाँचे में अभी भी एक बहुत बड़ी खामी यह है कि यदि कोई बच्चा अपनी यौनजनित जिज्ञासा को शान्त करना चाहता है तो हम या तो उसे अनसुना कर देते हैं या फिर उसे डाँट-डपट कर शान्त करा देते हैं। यदि किसी रूप में उसके सवालों का जवाब देते हैं तो इतनी टालमटोल से कि बच्चा असंतुष्ट ही रहता है। यही असंतुष्टता उसे यौनिक हिंसा, शारीरिक दुराचार का शिकार बनाती है। माता-पिता, शिक्षकों को ‘यौन शिक्षा’ के माध्यम से बच्चों को उनकी जिज्ञासा को सहज रूप से हल करना चाहिए, हाँ, यदि सवाल इस प्रकार के हों जो उसकी उम्र के अनुभव से परे हैं अथवा नितान्त असहज हैं तो उनका उत्तर ‘अभी आपकी उम्र इन सवालों को समझने की नहीं है’ जैसे सुलभ वाक्यों के द्वारा भी दिया जा सकता है। बच्चों के प्रश्नों के उत्तर उनकी सवालों की प्रकृति और परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसी तरह टीनएजर्स की ‘यौन शिक्षा’ का स्वरूप अलग होगा।
‘सेक्स एजूकेशन’ को लेकर मेरा व्यक्तिगत मत है कि इसकी विशेष आवश्यकता टीनएजर्स किशोरावस्था को है। यदि देखा जाये तो यह वह उम्र है जो ‘सेक्स लाइफ’ को आधुनिकतम जिज्ञासा से देखती है; जो आधुनिकतम संक्रमण के दौर से गुजर रही होती है। शारीरिक-यौनिक विकास एवं परिवर्तन, विपरीत लिंगी आकर्षण, शारीरिक सम्बन्धों के प्रति जिज्ञासा उन्हें शारीरिक सम्बन्धों की ओर ले जाती है जो विविध यौनजनित रोगों (एसटीडी) उपहार में देती है। शारीरिक-यौनिक विकास एवं परिवर्तन को समझने की चेष्टा में वे किसी गलत जानकारी, बीमारी का शिकार न हों, एच0आई0वी0/एड्स जैसी बीमारियों के वाहक न बनें इसके लिए इस उम्र के लोगों को ‘सेक्स एजूकेशन’ की आवश्यकता है। ‘यौन शिक्षा’ का पर्याप्त अभाव इस आयु वर्ग के लोगों को यौनिक जानकारी की प्राप्ति अपने मित्रों, ब्लू फिल्मों, पोर्न साइट आदि से करवाती है जो भ्रम की स्थिति पैदा करती है। इन स्त्रोतों से जानकारियाँ भ्रम की स्थिति उत्पन्न करने के साथ-साथ शारीरिक उत्तेजना भी पैदा करती है जो अवांछित सम्बन्धों, बाल शारीरिक शोषण, अप्राकृतिक सम्बन्धों आदि का कारक बनती है। अपनी शारीरिक-यौनिक इच्छापूर्ति मात्र के लिए के लिए किया गया शारीरिक-संसर्ग टीनएज प्रेगनेन्सी, गर्भपातों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ युवाओं में एस0टी0डी0, एच0आई0वी0/एड्स जैसी बीमारियों को तीव्रता से फैलाता है। एक सर्वे के अनुसार दिल्ली अकेले में एस0टी0डी0 क्लीनिक में प्रतिदिन आने वाले मरीजों की संख्या का लगभग 57 प्रतिषत 15-22 वर्ष की आयु वर्ग के लड़के-लड़कियाँ हैं। ‘यौन शिक्षा’ का अभाव इस संख्या को और भी अधिक बढ़ायेगा।
‘यौन शिक्षा’ को देने के पीछे यह मन्तव्य कदापि नहीं होना चाहिए कि युवा वर्ग सुरक्षित शारीरिक सम्बन्ध बनाये, जैसा कि लगभग एक दशक पूर्व केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री का कहना था कि मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन किसके साथ सोता है बस वे आपस में ‘कण्डोम’ का प्रयोग करते हों। इस प्रकार की कथित आधुनिक सोच ने ही भारतीय समाज को विचलित किया है, ‘यौन शिक्षा’ के मायने भी बदले हैं। ‘यौन शिक्षा’ के सकारात्मक एवं विस्तारपरक पहलू पर गौर करें तो उसका फलक उद्देश्यपरक एवं आशापूर्ण दिखायी पड़ेगा।
‘यौन शिक्षा’ के द्वारा सरकार, समाज, शिक्षकों, माता-पिता का उद्देश्य होना चाहिए कि वे एक स्वस्थ शारीरिक विकास वाले बच्चों, युवाओं का निर्माण करें। ‘यौन शिक्षा’ के एक छोटे भाग यौनिक अंगों की जानकारी, गर्भधारण की प्रक्रिया, प्रसव प्रक्रिया, गर्भपात आदि से अलग हट कर ‘यौन शिक्षा’ के द्वारा समाज में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की स्वीकार्यता, उसकी संस्कारिकता, उसके पीछे छिपे मूल्यों, शारीरिक विकास के विविध चरणों, शरीर के अंगों की स्वच्छता, अनैतिक सम्बन्धों से उपजती शारीरिक बीमारियाँ, यौनजनित बीमारियों के दुष्परिणाम, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों (माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहिन, मित्रों आदि) की आन्तरिकता एवं मर्यादा की जानकारी, उनके मध्य सम्बन्धों की मूल्यता, वैवाहिक जीवन की जिम्मेवारियाँ, इनके शारीरिक एवं आत्मिक सम्बन्धों की आवश्यकता, आपसी सम्बन्ध और उनमें आदर का भाव आदि-आदि अनेक ऐसे बिन्दु हो सकते हैं जो ‘यौन शिक्षा’ के रूप में समझाये जा सकते हैं। इन मूल्यों, सम्बन्धों, आन्तरिकता, पारिवारिकता, सामाजिकता, शारीरिकता आदि को समझने के बाद यौनजनित बीमारियों, एच0आई0वी0/एड्स आदि भले ही समाप्त न हो सकें पर इनके रोगियों की संख्या में बढ़ते युवाओं की संख्या में अवश्य ही भारी गिरावट आयेगी।
‘यौन शिक्षा’ को लागू करने, इसको देने के विरोध में जो लोग भी तर्क-वितर्क करते नजर आते हैं उनको भी सामाजिक-पारिवारिक-शारीरिक कसौटी पर कसना होगा। यह कहना कि ‘यौन शिक्षा’ तमाम सारी समस्याओं का हल है, अभी जल्दबाजी होगी पर यह कहना कि ‘यौन शिक्षा’ से विद्यालय, समाज एक खुली प्रयोगशाला बन जायेगा, एक प्रकार की ‘ड्रामेबाजी’ है। आज बिना इस शिक्षा के क्या समाज, विद्यालय और तो और परिवार भी क्या शारीरिक सम्बन्धों को पूर्ण करने की प्रयोगशाला नहीं बन गये हैं? जो कहते हैं कि पशु-पक्षियों को कौन सी ‘यौन शिक्षा’ दी जाती है पर वे सभी शारीरिक सम्बन्ध सहजता से बना लेते हैं, अपनी प्रजाति वृद्धि करते हैं, वे लोग अभी ‘यौन शिक्षा’ को मात्र शारीरिक सम्बन्धों की तृप्ति को समझने का एक माध्यम मान रहे हैं। ‘यौन शिक्षा’ का तात्पर्य अथवा उद्देश्य केवल स्त्री-पुरुष के यौनिक अंगों की जानकारी देना, यौनांगों के चित्र दिखाना, शारीरिक सम्बन्ध की क्रिया समझाना, गर्भधारण-प्रसव की प्रक्रिया समझाना मात्र नहीं है। समाज में शारीरिक सम्बन्धों को पवित्रता प्राप्त है जो सिर्फ पति-पत्नी के मध्य ही स्वीकार्य हैं और उनका उद्देश्य शारीरिक सुख-संतुष्टि के अतिरिक्त संतानोत्पत्ति कर समाज को नई पीढ़ी प्रदान करना भी है।
कहीं न कहीं ‘यौन शिक्षा’ की कमी ने पश्चिमी खुले सम्बन्धों को भारतीय समाज में पर्दे के पीछे छिपी स्वीकार्यता दी और पति-पत्नी के विश्वासपरक, पवित्र रिश्ते से कहीं अलग शारीरिक संतुष्टि की राह अपनायी। परिणामतः टीनएज प्रेगनेन्सी, बिन ब्याही माँएँ, यौनपनित बीमारी से ग्रसित युवा वर्ग, बलात्कार, बाल शारीरिक शोषण, गर्भपात, कूड़े के ढ़ेर पर मिलते नवजात शिशु, आत्महत्याएँ आदि जैसी शर्मसार करने वाली घटनाओं से हम नित्य ही दो-चार होते हैं। अन्त निष्कर्षतः एक वाक्य से कि मेरी दृष्टि में ‘यौन शिक्षा’ के स्वरूप, उद्देश्य, शैली के अभाव ने ही परिवार नियोजन के प्रमुख हथियार ‘कण्डोम’ को अनैतिक सम्बन्धों के, यौनजनित रोगों के, समय-असमय शारीरिक सुख प्राप्ति के, यौनाचार के सुरक्षा कवच के रूप में सहज स्वीकार्य बना दिया है। अच्छा हो कि ‘कण्डोम, बिन्दास बोल’, ‘आज का फ्लेवर क्या है?’, ‘कन्ट्रासेप्टिव पिल्स’ जैसे विज्ञापनों से शिक्षा लेते; महानगरों के सुलभ शौचालयों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों पर लगी ‘कण्डोम मशीनों’ पर भटकते; पोर्न साइट, नग्न चित्रों में शारीरिक-यौनिक जिज्ञासा को शान्त करते बच्चों, युवाओं को सकारात्मक, उद्देश्यपरक, संस्कारपरक, मूल्यपरक ‘यौन शिक्षा’ से उस वर्जित विषय की जानकारी दी जाये जो मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होने के बाद भी किसी न किसी रूप में प्रतिबंधित है।

हर रूप में निराले ‘निराला’

‘निराला’ अपने आपमें एक समाज; अपने आपमें सम्पूर्णता; अपने आपमें कविता या कहें कि अपने आपमें ही सम्पूर्ण साहित्य संसार थे। ‘निराला’ मात्र नाम के ही निराला नहीं थे वरन् उनकी शैली, उनकी अभिव्यक्ति, उनका लेखन सभी कुछ तो निराला कहा जा सकता है। हिन्दी काव्य को नया आयाम देने वाले महाकवि महाप्राण निराला हिन्दी के प्रथम कवि कहे जा सकते हैं जिन्होंने आधुनिक कविता को जन्म दिया। नयी अभिव्यक्ति, नवीन शैली के साथ प्रस्तुत ‘जूही की कली’, ‘कुकुरमत्ता’, ‘राम की शक्ति पूजा’ आधुनिक कविता का सशक्त उदाहरण कही जा सकतीं हैं।
निराला काव्य-कला को सौन्दर्य की पूर्ण सीमा मानते थे। उनका विचार था कि एक फूल के पूर्ण यौवन दर्शन हेतु जड़, तना, पल्लव, सुगन्धि आदि-आदि अपेक्षित हैं वैसे ही काव्य-कला के लिए शब्द, रस, ध्वनि, अलंकार, छन्द आदि का सामंजस्य आवश्यक है। काव्य को प्राणत्व की, मानव मात्र की मुक्ति चेतना के रूप में स्वीकारने वाले निराला की काव्य-यात्रा सन् 1920 में ‘प्रभा’ मासिक में प्रकाशित ‘जन्मभूमि’ नामक पहली कविता से प्रारम्भ हुई। इसके बाद मृत्यू पर्यन्त न तो उनकी लेखनी रुकी, न थकी और न ही सहमी।
कविता की पुष्टि और परिपक्व अनुगूँज हिन्दी काव्य जगत् में परिभ्रमण करती रही साथ ही निराला की साहसिक लेखनी निरन्तर साहित्य के प्रत्येक बिन्दुओं का स्पर्श करती रही। मुक्त रहने की भावना से ओत-प्रोत निराला ने स्वयं को मात्र कविता के सांचे में नहीं बाँधे रखा वरन् गद्य के भी प्रत्येक पहलू को बपने आसपास पाया। निबन्ध, आलोचना, कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, पत्र-साहित्य आदि को भी निराला ने निराली अभिव्यक्ति प्रदान की।
अप्सरा (1931), अलका (1933), प्रभावती (1936), निरुपमा (1936), कुल्लीभाट (1939), चमेली, इन्दुलेखा, लिली, काले कारनामे, सखी आदि के माध्यम से निराला ने गद्य में भी अपनी गहराई को दर्शाया है। उनके उपन्यासों और कहानियों में निराला धरती से जुड़े मूल यथार्थ को सामने लाते रहे हैं। मानव मूल्य चेतना को हमेशा दृष्टिगत रखने वाले निराला की पारखी नजर से सामाजिक यथार्थ कदापि अछूता नहीं रह सकता था। निराला जी ने समाज की लघुतम इकाई को देखकर पूरी महत्ता के साथ उसे समाज के सामने प्रस्तुत किया है। ‘अप्सरा’ में मूलतः वेश्या समस्या को निराला ने उठाया है। निराला की सोच कि आदमी आदमी है और शास्त्रानुसार सभी एक परमात्मा की सन्तान हैं; के कारण वे वेश्यापुत्री कनक का विवाह राजकुमार जैसे कुलीन व्यक्ति से करवाते हैं। इसी प्रकार ‘अलका’ में भी निराला ने जीवन की यथार्थता को गुम नहीं होने दिया है।
नारी की दिव्यता और उज्ज्वलता का चित्रण मनोयोग से करते हुए निराला जी का प्र्रगतिशील दृष्टिकोण अधिक मुखरित हुआ है। सामाजिक नीतियों, व्यवस्थाओं को सामने रखकर निराला ने जहाँ सामाजिक समस्याओं पर कुठाराघात किया है वहीं इन पर व्यंग्य भी किया है। जमींदारों का अत्याचार, ग्रामीण जीवन की संकीर्णता, सामाजिक रूढ़ियों आदि को ‘निरुपमा’ में दर्शाया गया है। सशक्त चित्रण में सिद्धहस्त रहे निराला ने अपने कथा साहित्य के द्वारा समस्याओं को सामने लाकर सामाजिक यथार्थ को ही प्रस्तुत किया है। जैसा कि निराला ने स्वयं ही स्वीकारा है कि ‘सत्य की कसैली अनुभूति को उजागर करने की अपेक्षा उन्होंने विधिवत् हास्य का सहारा लेकर ब्राह्मणों की अपने ‘पुरख्यातम् परम्परा’ का बड़ा सही जन्मांक प्रस्तुत किया है। ‘चतुरी चमार’ और ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ में भी निराला का यथार्थवादी दृष्टिकोण साने आया है। ‘चतुरी चमार’ को जूते गाँठने का काम देकर भी निराला ने उसके साहित्य सत्संग को किन्हीं चतुर्वेदियों से ऊपर माना है, उसको कबीर पदावली का विशेषज्ञ बताया है। समाज की इस जातिगत, क्षेत्रगत तथा व्यक्तियों को हीन मानने वाली व्यवस्था के विरुद्ध खुलकर लिखने का कार्य निराला जैसा लेखक ही कर सकता था। ‘चोरी की पकड़’ में वे जटाशंकर ब्राह्मण की कलई एक कहारिन द्वारा यह कहलवा कर खोलते हैं कि ‘होंठ से होंठ चाटते तुम्हारी जात नहीं गयी।’
जमीदारों, ब्राह्मणों, अफसरों के शोषण को दर्शाते निराला कहीं-कहीं स्वयं अपने जीवन का अभाव, अपने जीवन की बिडम्बना का उद्घाटन करते नजर आये हैं। सामाजिक अन्याय का विरोध, आर्थिक उत्पीड़न और सामाजिक भेदभाव का विरोध भी निराला मुखर होकर करते नजर आये हैं। वस्तुतः निराला का कथा साहित्य उनकी दोहरी चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। कवि स्वभाव के कारण वे मुक्तता के अभिलाषी रहे, सौन्दर्य, प्रेम और भावुकता की बात करते दिखे वहीं सामाजिक जीवन की रूढ़िग्रस्त नैतिकता के विरोधी भी रहे। इसके अतिरिक्त दूसरी ओर संघर्षशील और यथार्थवादी प्रवृत्तियों को वे महत्व देते हैं और रोमांसप्रियता से सामाजिक यथार्थ की ओर प्रवृत्त होते हैं।
कहा जाये तो निराला के उपन्यासों की प्रगतिशीलता की ओर आलोचकों की निगाह अभी विवेचनात्मक रूप में नहीं गई है। निराला जी की समालोचनात्मक दृष्टि सामाजिक यथार्थ को उघाड़ देने की प्रवृत्ति से निर्वेक्तिक शैली में उनकी कला को उच्चतम स्तर तक पहुँचाया है। उनके गद्य साहित्य में चाहे वह उपन्यास हो, कहानी हो या निबन्ध हो सभी में सुरुचि, दृष्छि की विराटता, यथार्थ की परख, ग्रमीण परिवेश को सजीव बनाने की क्षमता, निर्भीकता आदि तत्वों का समावेश मिलता है। इतने पर भी लगता है कि इन सब पर उनका कवि रूप ज्यादा भारी पड़ा है और जनमानस उसी से अभिभूत होता रहा है। काव्यत्व के साथ यदि निराला का गद्यकार स्वरूप-कथाकार, आलोचक-भी पाठकों ने समझा होता तो शायद निराला मात्र कवि रूप में अग्रगण्य न होते; उनका गद्यकार स्वरूप भी लोगों को अभिभूत करता रहता।