धुंध में एक किरण

'आस्था नर्सिंग होम', पर्ची पर लिखे नाम को सामने तीन मंजिला ईमारत पर टंगे विशालकाय बोर्ड से मिला कर रामनरेश आश्वस्त हुआ, अपनी पत्नी पार्वती की ओर उसने एक निगाह डाली और फ़िर दोनों पति-पत्नी नर्सिंग होम के भीतर पहुँच गए. बड़े से हॉल के चरों तरफ़ पड़ी कुर्सियों पर लोगों की भीड़, आसपास बने काउंटर और नर्सिंग होम द्वारा संचालित दवाखाने पर परेशानी के भाव लिय्त लोगों की उपस्थिति, कुछ कराहते, कुछ शांत, कुछ गुमसुम, कुछ बतियाते लोगों के बीच रामनरेश और पार्वती असहज सा महसूस कर रहे थे. नर्सिंग होम के कर्मचारियों और आगंतुकों के मध्य के अन्तर को समझने में नाकाम रहने के बाद रामनरेश ने एक आदमी को रोक कर डॉक्टर का पता पूछा. दो-तीन लोगों की अस्वीकृति के बाद सीधे एक काउंटर पर पहुँच कर उसने डॉक्टर के बारे में जानना चाहा.

"किसे दिखाना है?" एक सूखी सी आवाज़ काउंटर के भीतर से आई।"जी, अपनी पत्नी को दिखने है, वो पेट से है.""सामने सीढियों से ऊपर जाकर बाएं हाथ पर दूसरा कमरा.""जी, अच्छा." इतना कह कर रामनरेश मुड़ा ही था कि काउंटर से फ़िर आवाज़ आई, "पहले बगल से पर्ची बनवा लेना, जब ननम पुकारा जाए तब मिलना, समझे." रामनरेश सिर्फ़ सर हिला कर बगल वाले काउंटर से पर्चा बनवाने पहुंचा. दो-चार सवाल-जवाब के बाद उसके हाथ में पर्चा आ गया. पार्वती के नाम के साथ-साथ एक नंबर भी पडा था. काउंटर से पता चला कि इसी नंबर को पुकारे जाने पर डॉक्टर से मिलना होगा. दोनों आराम से ऊपर चढ़ कर कमरे के सामने पडी कुर्सियों पर बैठ गए.

ऊपर वाला हॉल भी नीचे वाले हॉल की तरह था मगर कुछ छोटा। इधर ज्यादा भीड़-भाद भी नहीं दिख रही थी. दस-दस, पाँच-पाँच कुर्सियों के सेट चारों ओर लगे थे जिन पर बैठे लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. आसपास एक उचटती सी निगाह डालते समय बगल की दीवार पर टंगी घड़ी में समय देखा, बारह बजने में दस मिनट कम. गाँव से यहाँ तक के समय का हिसाब लगते ही रामनरेश के हाथ-पैरों में थकान सी उभर आई. एक अंगडाई लेकर वह आँखें बंद कर कुर्सी पर पसर सा गया. पार्वती अपने बगल में बैठी एक अन्य औरत से धीरे-धीरे बतियाने लगी.

डाक्टर के कमरे के सामने बैठी औरत के द्वारा नंबर पुकारे जाने पर दोनों डॉक्टर के सामने खड़े हो गए। "नमस्ते साहिब", कह कर रामनरेश ने हाथ जोड़ लिए. डॉक्टर ने पर्चे पर से निगाह हटा कर रामनरेश और पार्वती की तरफ़ देख कर पूछा-"बैठो, कहो क्या समस्या है?"

"साहिब जे हमाई पत्नी है, जे पट से है और आप चेक कर के बता देओ कि पेट में मोडा (लड़का) है या मोड़ी (लड़की) है?" इतना कह कर रामनरेश ने एक कागज डॉक्टर के सामने सरका दिया। आसपास के गांवों में तैनात किए गए एजेंटों में से एक का पर्चा देख डॉक्टर भी आश्वस्त हुई कि सामने बैठे व्यक्ति किसी संस्था के या सरकारी जाँच करते व्यक्ति नहीं हैं. कागज फाड़ कर डस्टबीन में फेंकते हुए डॉक्टर बोली-"ऐसा क्यों चाहते हो?"

रामनरेश ने डॉक्टर की पर्चा फाड़ने की हरकत पर आश्चर्य जताते हुए पार्वती की ओर देखा फ़िर आराम से कहा-"डॉक्टर साहिब, हमाये दो बिटियाँ हैं, हम चाहत हैं कि अबकी बार लड़का हो जाए, बस। आप एक बेर देख लियो तो बड़ी किरपा हो जैहै."

अभी इतना ही, शेष अगली बार. तब पता चलेगा कि आगे हुआ क्या?

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