धुंध में एक किरण

कहानी का एक भाग आपने अभी तक पढ़ा, अब आगे..............

घडी की तरफ़ देख कर डॉक्टर साहिबा ने दोनों को तीन बजे का समय दिया और हिदायत दी-"देखो, कुछ नियमों के कारण यह नहीं बताया जा सकता कि पेट में लड़का है या लड़की........." बात समाप्त होने के पहले ही पति-पत्नी के मुंह से एक साथ निकला,"फ़िर।" "कुछ नहीं, जो रिपोर्ट तुम लोगों को मिलेगी उसी से तुम लोग समझ लेना. यदि लिफाफे का रंग हरा हो तो लड़का और यदि लाल हो तो समझना लड़की, ठीक. और हाँ, यहाँ किसी से चर्चा न करना कि इस काम के लिए आए हो." डॉक्टर ने अपना पक्ष साफ रखने की दृष्टि से दोनों को समझाया. दोनों बिना कुछ कहे डॉक्टर की अन्य हिदायतों का पालन करते हुए बहार बैठ कर तीन बजे का इंतजार करने लगे.

कुछ देर तक रामनरेश और पार्वती खामोशी का दामन थामे बैठे रहे फ़िर बड़े धीमे स्वर में पार्वती ने पूछा-"यदि मोंडी भी तो...?" रामनरेश ने कोई जवाब नहीं दिया, बस खामोशी से पार्वती को देखता रहा। वह ख़ुद नहीं सोच पा रहा था कि यदि लड़की हुई तो क्या करेगा? ऐसा नहीं है कि वह अपनी दोनों बेटियों को चाहता नहीं है, पर मन में दबी लड़का पाने की लालसा, माँ की मरने से पहले नाती का मुंह देखने की इच्छा, वंश वृद्धि की भारतीय सामाजिक सोच के आगे शायद वह भी नतमस्तक हो गया है.

"बाद में देखहैं कि का करनें है?" कह कर रामनरेश ने पार्वती को किसी और सवाल का मौका नहीं दिया। विचारों की श्रृंखला मन-मष्तिष्क को खंगाले ड़ाल रही थी. टी वी पर लड़कियों की सफलता की कहानी कहते कार्यक्रम, गाँव में संस्थानों द्वारा बेटियों के समर्थन में किए जाते नाटकों, कार्यक्रमों के चित्र उसके दिमाग में बन-बिगड़ रहे थे. सामाजिक अपराध, कानूनी अपराध, सजा, जुरमाना आदि शब्दावली परेशान करने के साथ-साथ उसे डरा भी रही थी. पार्वती को होने वाले नुकसान, किसी अमंगल से वह भीतर ही भीतर कांप जाता. पार्वती का मन भी शांत नहीं था. अपने पेट में पल रहे बच्चे का भविष्य मशीन द्वारा तय होते देख रही थी. कभी उसे लगता कि पेट में पल रहा बच्चा रो रहा है, कभी लगता कि उसकी दोनों बेटियाँ फ़िर उसकी कोख में आ गईं हैं और वह अपने हाथों से उनका गला घोंट रही है. घबरा कर वह अपना हाथ पेट पर फिराने लगती है. दोनों चुपचाप. खामोशी से मन ही मन गाँव के, घर के तमाम देवी-देवताओं का स्मरण करते मना रहे थे कि पेट में लड़का ही हो ताकि किसी तरह के अपराध से दोनों को गुजरना न पड़े. ऊहापोह में, विचारों के सागर में डूबते-उतराते, उनदोनों ने घड़ी में तीन से भी अधिक का समय देखा तो रामनरेश ने उठा कर टहलना शुरू कर दिया. थोडी देर में एक औरत ने आकर पार्वती को पुकारा. "हूँ" कह कर पार्वती खडी हो गई, रामनरेश भी पास में आ गया. उस औरत ने रामनरेश को वहीँ रुकने को कहा और पार्वती को लेकर हॉल के दूसरे किनारे बने कमरे में ले गई.

आज कहानी का इतना भाग, कुछ भाग कल............तब तक नमस्कार.

धुंध में एक किरण

'आस्था नर्सिंग होम', पर्ची पर लिखे नाम को सामने तीन मंजिला ईमारत पर टंगे विशालकाय बोर्ड से मिला कर रामनरेश आश्वस्त हुआ, अपनी पत्नी पार्वती की ओर उसने एक निगाह डाली और फ़िर दोनों पति-पत्नी नर्सिंग होम के भीतर पहुँच गए. बड़े से हॉल के चरों तरफ़ पड़ी कुर्सियों पर लोगों की भीड़, आसपास बने काउंटर और नर्सिंग होम द्वारा संचालित दवाखाने पर परेशानी के भाव लिय्त लोगों की उपस्थिति, कुछ कराहते, कुछ शांत, कुछ गुमसुम, कुछ बतियाते लोगों के बीच रामनरेश और पार्वती असहज सा महसूस कर रहे थे. नर्सिंग होम के कर्मचारियों और आगंतुकों के मध्य के अन्तर को समझने में नाकाम रहने के बाद रामनरेश ने एक आदमी को रोक कर डॉक्टर का पता पूछा. दो-तीन लोगों की अस्वीकृति के बाद सीधे एक काउंटर पर पहुँच कर उसने डॉक्टर के बारे में जानना चाहा.

"किसे दिखाना है?" एक सूखी सी आवाज़ काउंटर के भीतर से आई।"जी, अपनी पत्नी को दिखने है, वो पेट से है.""सामने सीढियों से ऊपर जाकर बाएं हाथ पर दूसरा कमरा.""जी, अच्छा." इतना कह कर रामनरेश मुड़ा ही था कि काउंटर से फ़िर आवाज़ आई, "पहले बगल से पर्ची बनवा लेना, जब ननम पुकारा जाए तब मिलना, समझे." रामनरेश सिर्फ़ सर हिला कर बगल वाले काउंटर से पर्चा बनवाने पहुंचा. दो-चार सवाल-जवाब के बाद उसके हाथ में पर्चा आ गया. पार्वती के नाम के साथ-साथ एक नंबर भी पडा था. काउंटर से पता चला कि इसी नंबर को पुकारे जाने पर डॉक्टर से मिलना होगा. दोनों आराम से ऊपर चढ़ कर कमरे के सामने पडी कुर्सियों पर बैठ गए.

ऊपर वाला हॉल भी नीचे वाले हॉल की तरह था मगर कुछ छोटा। इधर ज्यादा भीड़-भाद भी नहीं दिख रही थी. दस-दस, पाँच-पाँच कुर्सियों के सेट चारों ओर लगे थे जिन पर बैठे लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. आसपास एक उचटती सी निगाह डालते समय बगल की दीवार पर टंगी घड़ी में समय देखा, बारह बजने में दस मिनट कम. गाँव से यहाँ तक के समय का हिसाब लगते ही रामनरेश के हाथ-पैरों में थकान सी उभर आई. एक अंगडाई लेकर वह आँखें बंद कर कुर्सी पर पसर सा गया. पार्वती अपने बगल में बैठी एक अन्य औरत से धीरे-धीरे बतियाने लगी.

डाक्टर के कमरे के सामने बैठी औरत के द्वारा नंबर पुकारे जाने पर दोनों डॉक्टर के सामने खड़े हो गए। "नमस्ते साहिब", कह कर रामनरेश ने हाथ जोड़ लिए. डॉक्टर ने पर्चे पर से निगाह हटा कर रामनरेश और पार्वती की तरफ़ देख कर पूछा-"बैठो, कहो क्या समस्या है?"

"साहिब जे हमाई पत्नी है, जे पट से है और आप चेक कर के बता देओ कि पेट में मोडा (लड़का) है या मोड़ी (लड़की) है?" इतना कह कर रामनरेश ने एक कागज डॉक्टर के सामने सरका दिया। आसपास के गांवों में तैनात किए गए एजेंटों में से एक का पर्चा देख डॉक्टर भी आश्वस्त हुई कि सामने बैठे व्यक्ति किसी संस्था के या सरकारी जाँच करते व्यक्ति नहीं हैं. कागज फाड़ कर डस्टबीन में फेंकते हुए डॉक्टर बोली-"ऐसा क्यों चाहते हो?"

रामनरेश ने डॉक्टर की पर्चा फाड़ने की हरकत पर आश्चर्य जताते हुए पार्वती की ओर देखा फ़िर आराम से कहा-"डॉक्टर साहिब, हमाये दो बिटियाँ हैं, हम चाहत हैं कि अबकी बार लड़का हो जाए, बस। आप एक बेर देख लियो तो बड़ी किरपा हो जैहै."

अभी इतना ही, शेष अगली बार. तब पता चलेगा कि आगे हुआ क्या?