मन का रोंदन किसने जाना।

स्पंदन के प्रधान संपादक डॉ० ब्रजेश कुमार जी की कविता
जग ने देखी वह मुक्त हंसी, मन का रोंदन किसने जाना।
किसने समझा हर धड़कन में, सौ-सौ संसार पला होगा।।
मुस्का कर जग ने छीना,
सुख सपनों का संसार मेरा।
दो टूक खिलौने के लेकर,
सीखा दुल्राना प्यार तेरा।
सबने देखी मुख की शोभा, अन्तर का तम किसने जाना।
किसने समझा हर ज्वाला में, सौ-सौ विश्वास जला होगा॥
चाहा था हम हंस लें जी भर,
कलियों को आँचल में भर लें।
सपने मुस्का कर खिल जायें,
आकाश को बढकर के छू लें।
सबने देखी वह क्षितिज रेख, बिछुदन का दुःख किसने जाना।
किसने समझा हर चितवन में, सौ-सौ वरदान डाला होगा॥
जो टकरा कर तट से लौटे,
वह मेरे मन की चाह नहीं।
भवरों में पड़ कर खो जाए,
वह मेरी अपनी आह नहीं।
सबने देखी लहरें चंचल, तल का पत्थर किसने जाना।
किसने समझा हर ठोकर में, सौ-सौ पग प्राण चला होगा॥

स्त्री विमर्श के पीछे

भूमन्दलीकरण के इस दौर में जब समाज में स्त्री विमर्श की चर्चा की जाती है तो स्त्री विमर्श की वास्तविकता और कल्पना के मध्य बारीक सी रेखा विश्व स्तर पर दिखाई देती है. इसी बारीक अन्तर के मध्य चार घटनाओं को स्त्री विमर्श के साथ रेखांकित किया जाना भी अनिवार्य प्रतीत होता है. सन् १७८९ की फ्रांसीसी क्रांति जिसने समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व के नैसर्गिक अधिकारों को लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के रूप मे प्रतिष्ठित किया. सन् १८२९ का राजा राममोहन राय का सती प्रथा विरोधी कानून जिसने स्त्री को मानव के रूप में स्वीकारा. तीसरी यह कि सन् १८४८ में ग्रिम्के बहिनों ने तीन सौ स्त्री पुरुषों की सभा के द्वारा नारी दासता को चुनौती देकर स्त्री विमर्श की आधारशिला रखी और चौथी घटना सन् १८६७ में स्टुअर्ट मिल द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट में स्त्री के वयस्क मताधिकार का प्रस्ताव रखा जिसने स्त्री को भी मिलने वाले कानूनी और संवैधानिक अधिकारों को बल दिया. इन घटनाओं में ध्यान देने योग्य यह है की पूर्व हो या पश्चिम, स्त्री विमर्श की सैधांतिक आधारशिला पुरुषों द्वारा ही तैयार की गई जिस पर आधुनिक स्त्रियों द्वारा स्त्री विमर्श को आन्दोलन बना कर नारी स्वरूप को विकृत करने का प्रयास किया जा रहा है.
स्त्रियों ने अपनी स्थिति को सुद्रण किया, स्वयं को शिक्षा, राजनैतिक अधिकारों, संवैधानिक अधिकारों से परिचित करवाया तो इसी शक्ति का प्रयोग उसने स्वयं को संस्कारों, परिवारों से मुक्त कर देने में किया. यह विडम्बना है कि आज की नारी स्त्री विमर्श की, स्त्री शक्ति की सफलता इस बात पर मानती है की वह एक साथ कितने पुरुषों की शारीरिक शक्ति का परीक्षण कर सकती है. वह सोचती है की पुरूष वेश्यालय कब बनेंगे. आज स्वतंत्र घोषित कर चुकी नारी की चाह अपने परिवार की लडकी का भविष्य बनाने में नहीं वरन यह ध्यान देने में है कि कहीं असुरक्षित यौन संबंधों से वह एड्स का शिकार न हो जाए. वह परिवार में रह कर पिता, पति, पुत्र के रूप में अपना शासक पाकर स्वयं को शोषित समझती है किंतु वह इस बात में संतुष्टि पाती है की वह अविवाहित रह कर प्रत्येक रात कितने अलग अलग पुरुषों का भोग कर सकती है, अपने मांसल शरीर के पीछे नचा सकती है.
शारीरिक – मानसिक और भावनात्मक रूप से स्त्री शक्ति की पहरुआ नारियों ने स्त्री विमर्श को स्त्री स्वतंत्रता को नारी देह के आसपास केंद्रित कर दिया है. पुरूष वर्ग के विरोध में खड़ी नारी शक्ति स्वयं को नारी हांथों में खेलता देख रही है. यदि कुछ वास्तविकताओं को ध्यान में रखा जाए तो महिलाओं को मिलते अधिकार, शिशु प्रजनन अधिनियम, अपनी मर्जी से परिवार को सीमित रखने का अधिकार, तलाकशुदा नारी को बच्चा पाने का कानूनी अधिकार आदि महिलाओं के यौन प्रस्तुतीकरण से सम्भव नहीं हुआ है. गे-कल्चर, स्पर्म बैंक, सरोगेत मदर्स, ह्यूमन क्लोनिंग की संभावनाओं ने स्त्रियों की आजादी को नया आयाम दिया है तो उसे भयाक्रांत भी किया है. टी वी की सेत्युलैद चमक और परदे की रंगीनियाँ स्त्री को आजादी की राह का सपना तो दिखा सकती हैं पर आजादी नहीं दिला सकती है. तभी तो अपने उत्पाद को बेचने के लिए निर्माता वर्ग किसी नग्न महिला को ही चुनता है.
कम से कमतर होते जा रहे वस्त्रों ने नारी वर्ग को उत्पाद सिद्ध किया है. स्त्री विमर्श के नाम पर देह को परोसा जा रहा है. पुरूष निर्मित आधार तल पर खड़े होकर, स्वयं को उत्पाद बना कर, देह को आधार बना कर स्त्री विमर्श, नारी मुक्ति की चर्चा करमा भी बेमानी सा लगता है. स्त्री विमर्श की आड़ में नारी को सपना दिखा रही नारी जात को विचार करना होगा की स्त्री अपनी मुक्ति चाहती है तो क्या पुरूष वर्ग के विरोधी के रूप में? यहाँ विचार करना होगा की बाजारवाद के इस दौर में स्वयं को वस्तु सिद्ध करती नारी किस स्वतंत्रता की बात करना चाह रही है?

( साहित्यिक पत्रिका ‘कथा क्रम’ अप्रैल-जून २००८ में प्रकाशित लेख “स्त्री विमर्श के पीछे क्या छिपा है?” का अंश। पूरे लेख के लिए देखें www.kathakram.in
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पुकार

माँ,
मुझे एक बार तो जन्मने दो,
मैं खेलना चाहती हूँ
तुम्हारी गोद मैं,
लगना चाहती हूँ
तुम्हारे सीने से,
सुनना चाहती हूँ
मैं भी लोरी प्यार भरी,
मुझे एक बार जन्मने तो दो;

माँ,
क्या तुम नारी होकर भी
ऐसा कर सकती हो,
एक माँ होकर भी
अपनी कोख उजाड़ सकती हो?
क्या मैं तुम्हारी चाह नहीं?
क्या मैं तुम्हारा प्यार नहीं?
मैं भी जीना चाहती हूँ,
मुझे एक बार जन्मने तो दो ;

माँ,
मैं तो बस तुम्हे ही जानती हूँ,
तुम्हारी धड़कन ही पहचानती हूँ,
मेरी हर हलचल का एहसास है तुम्हे,
मेरे आंसुओं को भी
तुम जरूर पहचानती होगी,
मेरे आंसुओं से
तुम्हारी भी आँखें भीगती होगी,
मेरे आंसुओं की पहचान
मेरे पिता को कराओ,
मैं उनका भी अंश हूँ
यह एहसास तो कराओ,
मैं बन के दिखाऊंगी
उन्हें उनका बेटा,
मुझे एक बार जन्मने तो दो;


माँ,
तुम खामोश क्यों हो?
तुम इतनी उदास क्यों हो?
क्या तुम नहीं रोक सकती हो
मेरा जाना ?
क्या तुम्हे भी प्रिय नहीं
मेरा आना?
तुम्हारी क्या मजबूरी है?
ऐसी कौन सी लाचारी है?
मजबूरी..??? लाचारी...???
मैं अभी यही नहीं जानती,
क्योंकि
मैं कभी जन्मी ही नहीं,
कभी माँ बनी ही नहीं,
माँ,
मैं मिताऊंगी तुम्हारी लाचारी,
दूर कर दूंगी मजबूरी,
बस,
मुझे एक बार जन्मने तो दो.

तुम्ही बताओ इस आवाज़ पर थिरके कौन?

चलो फ़िर हलचल मची है शहर मे
कोई कुछ सुना गया है शहर मे
ये आवाज़ कुछ अलग सी है
दिल मे एक दर्द जगाती सी है
इसके साये मे कुछ छिपा सा है
इसमे एक महक भरी सी है
क्यों इसके साथ कोई झूमता नहीं है
क्यों कोई इस आवाज़ पर थिरकता नहीं है
देखो ध्यान से, सुनो गौर से,
इस आवाज़ मे धमक सी है
कहीं बम जैसी कहीं चीख जैसी
तुम्ही बताओ इस आवाज़ पर झूमे कौन?
तुम्ही बताओ इस आवाज़ पर थिरके कौन?