रविवार, 18 दिसंबर 2016

रहस्य जीवन का

२ - रहस्य जीवन का
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जीवन रूपी रहस्य को
मत खोज मानव,
डूब जायेगा
इसकी गहराई में।
तुम से न जाने कितने
डूब गये इसमें पर
न पा सके तल
जीवन रूपी सागर का।
छिपा है मात्र इसमें ढ़ेर
लाचारी का,
अंबार बेबसी का।
नदी है कहीं आँसुओं की,
तो कहीं आग है नफरत की।
चारों ओर बस लाचारी है,
कहीं गरीबी का उफान है
तो कहीं भूख का तूफान है।
नहीं रखा है कुछ भी
खोज में इसकी,
घिर कर इसमें पछतायेगा,
सिर टकरायेगा पर
न पा सकेगा रहस्य
इस जीवन का।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

मेरा भारत महान!

१- मेरा भारत महान! 

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सालों पहले देखा
सपना एक
भारत महान का।
आलम था बस
इन्सानियत, मानवता का,
सपने के बाहर
मंजर कुछ अलग था,
बिखरा पड़ा था...
टूटा पड़ा था...
सपना...
भारत महान का।
चल रही थी आँधी एक
आतंक भरी,
हर नदी दिखती थी
खून से भीगी-भरी,
न था पीने को पानी
हर तरफ था बस
खून ही खून।
लाशों के ढ़ेर पर
पड़ा लहुलुहान...
कब सँभलेगा
मेरा भारत महान!

सोमवार, 31 अक्तूबर 2016

ओ भारतमाता के प्रहरी, है तुमको बारम्बार नमन

ओ भारतमाता के प्रहरी,
है तुमको बारम्बार नमन.

अडिग हिमालय है तुमसे,
तुमसे सागर में गहराई.
धरती की व्यापकता तुमसे,
तुमसे अम्बर की ऊँचाई.
ओ भारतमाता के प्रहरी,
है तुमको बारम्बार नमन.

तुमसे मुस्काता है बचपन,
तुमसे इठलाती है तरुणाई.
शौर्य तुम्हारा नस-नस में,
भर ले ज़र्रा-ज़र्रा अंगड़ाई.
ओ भारतमाता के प्रहरी,
है तुमको बारम्बार नमन.

तीन रंग की आज़ादी,
है लाल किले पर लहराई.
तुमसे है सम्मान, सबल,
है गरिमा भी तुमसे पाई.
ओ भारतमाता के प्रहरी,
है तुमको बारम्बार नमन.

जय वीरों की, जय सेना की,
देता है जयघोष सुनाई.
जले दीप से दीप कई तो,
देश है देता संग दिखाई.
ओ भारतमाता के प्रहरी,
है तुमको बारम्बार नमन.


शुक्रवार, 17 जून 2016

संरक्षित करने के लिए पहले मारना जरूरी है

मारना और बचाना अन्योनाश्रित क्रियाएँ हैं. यदि किसी को बचाना है तो उसको मारना जरूरी है. बिना मारे बचाने जैसा कदम उठाया भी नहीं जा सकता है. ये क्रियाएँ विनाश और विकास की तरह हैं. विध्वंस और निर्माण के समतुल्य हैं. दो अलग-अलग प्रकृति की क्रियाओं का एकदूसरे से सम्बद्ध होना आश्चर्य का विषय नहीं है. अनादिकाल में स्वयं भगवान ने युद्धभूमि में उपदेशों के द्वारा अपने सखा-शिष्य को समझाया था कि निर्माण के लिए विध्वंस आवश्यक है. विकास की प्रक्रिया के लिए विनाश अनिवार्य है. मारना और बचाना भी ठीक इसी तरह की अन्योनाश्रित व्यवस्था है. आश्चर्य देखिये कि मारने-बचाने जैसी व्यवस्था को राजा से बोधिसत्व की ओर गए भगवान ने भी सिद्ध किया था. उन्होंने केवल शाब्दिक कृत्य से नहीं वरन एक पक्षी के द्वारा मारने-बचाने की क्रिया की अन्योनाश्रितता को प्राप्त किया था.

उनके बाद से समय-समय पर मारने-बचाने की अवधारणा पर कार्य किये जाते रहे. हर बार जानवरों को ही निशाना बनाया जाता रहा. ये उपक्रम तब तक चलता जब तक कि उसकी प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर न पहुँच जाती. ज्यों ही प्रजाति विलुप्तिकरण का एहसास होता त्यों ही उसके बचाए जाने के प्रयासों का द्वार खोल दिया जाता. मारने की प्रक्रिया के बाद बचाए जाने की प्रक्रिया स्वतः आरम्भ कर दी जाती. गौरैया बचाई जाने लगी. बाघ बचाए जाने लगे. हिरन संरक्षित किये जाने लगे. गिद्ध खोजे जाने लगे. घड़ियाल अभ्यारण्य में पाले जाने लगे. कुल मिलाकर ऐसी कई-कई प्रजातियों के विध्वंस के बाद उनके निर्माण की बात सोची जाने लगी. उनके विनाश के बाद उनके विकास की प्रक्रिया अपनाई जाने लगी. उनके निर्वासन के बाद उनके संरक्षण की चर्चा होने लगी. कई-कई पक्षियों की प्रजातियाँ इसके बाद भी बचाई न जा सकीं और विलुप्त हो गईं. ये तो बाघ की किस्मत अच्छी कही जाएगी, जिसकी संख्या को इस प्रक्रिया में बढ़ा लिया गया.


कालगणना में कई-कई युग बीत जाने के बाद पुनः भगवन-वाणी ने अपने को सिद्ध करने का अवसर तलाश लिया. अबकी किसी भगवान ने नहीं वरन भक्त-सदस्य के द्वारा मारने-बचाने की अन्योनाश्रिता को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है. मारने की क्रिया को अब आदेशात्मक रूप प्रदान किया गया. निशाने पर अबकी बार भी जानवर ही आया. लाभ-हानि, नफा-नुकसान के समीकरण के बाद उस जानवर को फसलों के लिए, किसानों के लिए घातक सिद्ध कर लिया गया. इस समीकरण के चलते अभी मारने की क्रिया को प्रमुखता दी गई. प्राकृतिक रूप से ये प्रक्रिया तब तक अमल में लाई जाएगी, जब तक ये न साबित हो जाये कि सम्बंधित जानवर की प्रजाति विलुप्तिकरण की कगार पर पहुँच गई है. इसके बाद बचाए जाने की, संरक्षित करने की प्रक्रिया आरम्भ की जाएगी. उस जानवर की प्रजाति बचेगी या नहीं, ये तो भविष्य बताएगा. अभी तो उसकी प्रजाति को मारने का आदेश है. आदेश का पालन पूर्ण प्रतिबद्धता से हो रहा है. काश कि बेटियों को गर्भ में न मारने के आदेश का पालन भी इतनी ही प्रतिबद्धता से हो पाता. अफ़सोस कि सभी प्रजातियों की किस्मत बाघ जैसी अच्छी नहीं होती. 

गुरुवार, 12 मई 2016

ठ से ठठेरा की जगह ठ से ठुल्ला पढ़ाने की कोशिश

आखिर ठुल्ला कहने पर इतना बवेला क्यों? किसी भी बात के कई पहलू हो सकते हैं. कुछ ऐसा ही इस शब्द में भी है, बस गौर करने की जरूरत है. ठुल्ला या कहें ठलुआ, बात घूम-फिर कर एक ही अर्थ देती है. अब इसकी आवश्यकता अगले व्यक्ति को क्यों आन पड़ी ये भी समझना होगा. अगले व्यक्ति ने ठुल्ला शब्द से हिन्दी वर्णमाला को संशोधित करने का पुनीत कार्य आरम्भ किया है. इसके द्वारा एक ऐसे शब्द को प्रतिस्थपित करने का प्रयास है जो अब समाज में दिखता ही नहीं. इसके बाद भी हिन्दी वर्णमाला में उसे नियमित रूप से पढ़ाया जा रहा है. जी हाँ, कई-कई पीढ़ियाँ हिन्दी पढ़ते-सीखते में ठ से ठठेरा ही पढ़ती रही. जिस पीढ़ी ने ठठेरा देखा उसने भी पढ़ा. जिस पीढ़ी ने ठठेरा सुना उसने भी पढ़ा. अब जिस पीढ़ी ने न ठठेरा सुना, न देखा वो भी ठ से ठठेरा पढ़ रही है. ये स्थिति तो शब्दों के साथ दोयम दर्जे का बर्ताव करने जैसी है. आखिर ऐसे किसी शब्द की आवश्यकता ही क्या है जिसका परिचालन ही समाज में न हो रहा हो. कितनी बड़ी विडम्बना है कि समाज में कहीं ठठेरा दिख नहीं रहा इसके बाद भी पढ़ाया जा रहा है. आखिर भिश्ती नहीं दिखता सो पढ़ाया भी नहीं जा रहा. मसक नहीं दिखती सो उसे भी नहीं पढ़ाया जा रहा है. खेतों में रहट नहीं दिखाई देते इसलिए वे भी गायब हैं. भाषा में, शब्दों में ऐसे परिवर्तन होते रहने चाहिए. इससे शब्द-सम्पदा का विकास तो होता ही है, ज्ञान में भी समकालीनता आती है.

कुछ शब्द सामाजिक परिवर्तन के चलते अपने आप बदल गए. या कहें कि विकसित होकर आ गए. फटफटिया कब मोटरसाइकिल बनी और कब बाइक बनकर हमारे बीच दौड़ने लगी, पता ही नहीं चला. इसी तरह से तश्तरी गायब हो गई सिर्फ प्लेट बची. अम्मा गायब होकर मम्मी से मॉम हो गई. वैसे ये भी एक तरह का विकास है. इसमें कम से कम जो शब्द बोले जा रहे हैं, जिनके लिए बोले जा रहे हैं उनका कोई अस्तित्व तो है ही. ये कितना ख़राब है कि जिस शब्द के बारे में पढ़ रहे हैं वो अस्तित्व में ही नहीं है. उसका ओर-छोर ही नहीं है. ऐसे शब्दों का विलोपन करके नए-नए शब्दों को स्थापित करना चाहिए. ऐसे शब्दों को पढ़ना-पढ़ाना चाहिए जिनका कोई अस्तित्व हो. भाषा-वैज्ञानिकों को इस तरफ प्रयास करने चाहिए थे किन्तु नहीं किये.


एक व्यक्ति ने अपनी पूरी ताकत लगाकर ठ से ठठेरा के स्थान पर ठ से ठुल्ला को प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया है. ठुल्ला शब्द को ठलुआ अपभ्रंश मान सकते हैं अर्थात हिन्दी के क्रमिक विकास का अनुपालन करते हुए ही नए शब्द का निर्माण किया गया है. एक ऐसे शब्द को पुनर्जीवित किया गया है जिसका अस्तित्व समाज में मिलता है. इस शब्द-परिवर्तन पर उसका स्वागत होना चाहिए. यहाँ स्वागत के बजाय अदालत से नोटिस जारी हो रहे हैं. किसी की अस्मिता को ठेस पहुँच रही है. अब ठ से ठठेरा की जगह ठ से ठुल्ला पढ़ाया जाना चाहिए. इससे तमाम माता-पिता अपने बच्चों के उन सवालों की मार से बच सकेंगे जो ठठेरा को जानने के लिए उछालते थे. बच्चों को भी सहजता से ठ से ठुल्ला के बारे में बताया जा सकेगा, ठुल्ला के बारे में समझाया जा सकेगा. शाब्दिक सम्पदा के इस विस्तार को प्रोत्साहित करना चाहिए. आने वाले दिनों में हिन्दी वर्णमाला में ठ से ठठेरा की जगह ठ से ठुल्ला पढ़ने को मिले, यही कामना करते हैं. 

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

जूते की उछाल में छिपे सवाल भी उछल गए - व्यंग्य


जूता एक बार फिर उछला. जूते का निशाना एक बार फिर चूका. सवाल उठता है कि जूता अपने निशाने से क्यों भटक जाता है? सवाल ये भी कि या फिर जूते को लक्ष्य तक पहुँचाने वाले का मकसद सिर्फ जूता उछालना होता है? अब जूता उछला है तो लक्ष्य तक पहुँचना भी चाहिए. पहुँचता भी है मगर निरर्थक रूप से. न अपने लक्ष्य को भेदता है और न ही उछलने को सिद्ध करता है. वैसे जूते की उछाल राज्य स्तरीय होते-होते कब राष्ट्रीय से अंतर्राष्ट्रीय हो गई पता ही नहीं चला. इस वैश्विक छवि के बाद भी जूते की उछाल ने अपने मूल को नहीं छोड़ा. अपने राज्य स्तरीय स्वरूप को नष्ट नहीं होने दिया. वैसे जूते का उछलना बहुत कुछ कह देता है. 

प्रथम दृष्टया तो साफ समझ आता है कि आसपास कहीं चुनावी माहौल बन रहा है. एक बात ये भी हो सकती है कि जूते का उछलना सवालों का उछलना हो सकता है. इसके बाद भी हर बार बस जूता ही उछलता है, सवाल कहीं पीछे रह जाते हैं. सवालों के जवाबों को छोड़कर सब सामने आने लगता है. ये गलत है, लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हनन है. आखिर जूता उछालने वाले ने सिर्फ खबरों में आने के लिए तो जूता उछाला नहीं होगा? आखिर उसके जानबूझ कर निशाना चूकने या फिर धोखे से चूक जाने में भी कोई मामला छिपा होगा? इनको खबर बनाने के बजाय जूते को खबर बना दिया जाता है. और विडम्बना भी देखिये, उस जूते को खबर बना दिया जाता है जो अपने दूसरे साथी जूते से अलग हो गया. जो जूता अपने लक्ष्य से भटक गया. कम से कम एक बार उस निशानेबाज से भी जानकारी करनी चाहिए कि आखिर उसने जूते को उछालने का कृत्य क्यों किया? जो व्यक्ति उसके जूते का निशाना था वो किस लक्ष्य से भटका था? उछलने वाला जूता तुम्हारे अपने ही पैर का था या किसी और के पैर का था? 

जूते उछालबाज़ी की दुनिया में शायद ये सब निरर्थक सा लगे किन्तु अपने आपमें बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. आखिर यदि जो व्यक्ति निशाने पर था वो अपने लक्ष्य से भटका तो फिर निशानेबाज का निशाना क्यों चूका? यदि जूता अपने ही पैर का था तो फिर उस शिद्दत से क्यों नहीं उछला कि लक्ष्य से जा टकराता? यदि जूता उछालना महज प्रचार था तो फिर एक ही क्यों कई-कई जूते उछाले जा सकते थे? एक ही व्यक्ति पर क्यों कई-कई पर उछाले जा सकते थे? सिर्फ जूते ही क्यों? सिर्फ स्याही ही क्यों बहुत कुछ उछाला जा सकता था. चुनावी मौसम में ही जूते का उछलना क्यों? गौर से देखिये, तो ये सिर्फ जूता उछलने की क्रिया नहीं है वरन मानसिकता के उछलने की क्रिया है. लोकतान्त्रिक व्यवस्था के उछलकर गिरने की क्रिया है. जनतंत्र के जन से दूर होते जाने की प्रतिक्रिया है. काश कि अबकी जूता उछले तो निशाने पर लगे. काश कि अबकी जूता उछले तो सवालों को हल करता हुए उछले.

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

ब्याज पर बट्टा - व्यंग्य

‘माया महाठगिनी हम जानी’ के अमरघोष के बाद भी माया लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र सदैव बनी रही. इस मायामोह के चक्कर में लोग ज्यादा न फँसें, ज्यादा न बहकें इसके लिए समाज के ज्ञानी-ध्यानी बुजुर्गों ने ब्याज को हराम बताते हुए लोगों को इससे दूर रहने की सलाह दी. समाज ने इसे माना-स्वीकारा भी और एक लम्बे समय तक ब्याज के धन को अपनी-अपनी जेब से दूर रखा. परिवर्तन तो प्रकृति का सत्य है सो समाज में भी परिवर्तन दिखा. ज्ञानी बुजुर्ग लुप्त होते गए, ब्याज पाने की लालसा वाले जन प्रकट होते गए. ब्याज की रकम को वैधता प्रदान करने के लिए, उसके ऊपर से हराम की कमाई का काला ठप्पा हटाने का प्रयास किया गया. इस प्रयास में लोगों ने ‘मूल से अधिक सूद प्यारा होता है’ का नया नारा पेश किया. इस नारे को और भी व्यापक बनाने की नीयत ऊपर बैठे लोगों में भी दिखी. 

आखिर धन-लिप्सा तो उनके भीतर भी थी. सो जनता की चाहत और आकाओं की नीयत ने मिलकर एक नया रूप निर्माण किया. दीर्घ बचत, अल्प बचत, लघु बचत के नए-नए कलेवरों के माध्यम से ब्याज की रकम जेब के अन्दर करने का सर्व-स्वीकार्य कार्य नीचे से ऊपर तक किया गया. बुजुर्गों की नसीहत के अपराधबोध से निकल कर अब बचत के नाम पर ब्याज की रकम खूब अन्दर की जाने लगी. बचत की बचत, ब्याज का ब्याज, रकम पर रकम और कहीं से भी बिना मेहनत की कमाई का अपराधबोध भी नहीं. क्या खूब दिन थे, ‘पाँचों उँगलियाँ घी में और सर कड़ाही में’ था. 

तभी अचानक भूचाल सा आ गया. ज्ञानी-ध्यानी बुजुर्गों की आत्मा ने पुनर्जागरण किया. ब्याज दिए-लिए जाने में त्रुटिपूर्ण कृत्य दिखाई दिया. ऐसी आत्माओं ने तत्काल, विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए किसी भी रूप में जेब के अन्दर की जा रही ब्याज की कमाई पर अपना रोष प्रकट किया. प्राचीनता का अनुपालन करते हुए ब्याज को रोकने का उपक्रम शुरू किया. यद्यपि वे जनभावनाओं को समझते थे तथापि एकदम से कुल्हाड़ी न चलाते हुए महीन से कैंची चला दी. ऐसी कैंची, जिससे जेब भी न कटे और ब्याज की रकम भी पूरी न मिले. इधर लोग ब्याज की रकम से मौज मनाने के मूड में थे उधर बुजुर्गियत भरी आत्माओं ने विकास-विकास कहते हुए रंग में भंग कर दिया.